मन्दिर और सन्तो के पास जाकर सिर झुकाते हैं क्योंकि सिर में गुस्से का, गर्दन में मान का, हृदय में माया का और पेट में लोभ का वास होता है, अर्थात् हम देव-शास्त्र-गुरु के सामने झुक कर अपनी कषायों का विसर्जन करते हैं। भक्ति 0 – भेजें
न कोई प्यार, न कोई प्रशंसा- ईमानदार व्यक्ति किसी विद्वान के पास पहुँचा, बोला मैं ईमानदारी से जीवन यापन करता हूँ, पर कोई मेरी प्रशंसा नहीं करता और न प्यार, विद्वान ने कहा ईमानदारी अच्छी बात है, पर उसके साथ मधुर व्यवहार और सेवाभाव भी जुड़ा रहना चाहिये, यदि आप इतना करते हो तो फिर प्रशंसा की कमी नहीं रहेगी और न प्यार पाने की शिकायत करना पड़ेगी। चरित्र 0 – भेजें
पहले आदमी जङ्गली था, तब कन्दमूल खाता था, फिर थोड़ा समझदार हुआ तो अन्न खाने लगा, और आधुनिक हुआ तो रुपया कमाने लगा, ध्यान रखना पेट रुपयों से नहीं रोटी से भरेगा। संतोष 0 – भेजें
देश के प्रति ईमानदार- जापान में दो भारतीयों ने सिगरेट पीकर सड़क पर डाल दी, कुछ बच्चों ने उठाकर कचरादान में डाल दी, पूँछा आप क्या कर रहे हैं? बच्चों ने कहा! हम अपने देश की सड़कों को गन्दा नहीं देख सकते, आप अतिथि हैं इसलिये आपका स्वागत है। चरित्र 0 – भेजें
एक भारतीय विदेश इलाज कराने गया, उसको दूध की आवश्यकता थी, दूध वाले से माँगा, उसने कहा आज नहीं मिल सकता, कण्ट्रोल का दूध है, तुम चाहों तो मकान मालिक से लेलो, भारतीय ने कहा तुम पानी क्यों नहीं मिला लेते, उसने कहा तुम देश के गद्दार हो, विवाद हो गया, मकान मालिक ने उसको घर से निकाल दिया, गद्दार को हमारे देश में स्थान नहीं है। चरित्र 0 – भेजें
अच्छे इंसान बनाने की योजना- आइंस्टीन से किसी ने पूँछा संसार में इतना दुःख कलह क्यों है, जबकि विज्ञान ने एक से बढ़कर एक सुख-साधन दिये हैं, उत्तर मिला कि बस एक कमी रह गयी कि अच्छे मनुष्य बनाने की योजना नहीं बनी, देश व सम्प्रदाय के पक्षधर सभी दिखते हैं, पर ऐसे लोग नहीं दिखते जो अच्छे इंसान बनाने की योजना बनाये। चरित्र 0 – भेजें
व्यर्थता- गुण न हो तो रूप व्यर्थ है, नम्रता न हो तो विद्या व्यर्थ है, साहस न हो तो हथियार व्यर्थ है, होश न हो तो जोश व्यर्थ है, उपयोग न हो तो धन व्यर्थ है, भूख न हो तो भोजन व्यर्थ है, परोपकार जो न कर सके उसका जीवन व्यर्थ है। चरित्र 0 – भेजें