नीरस जीवन को सरस, सूने आँगन में रौनक, पतझड़ में बसन्त, निराश जीवन में उत्साह भरने वाले त्यौहार कहलाते हैं। Misc. 0 – भेजें
राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक के भेद से त्यौहार तीन प्रकार के होते हैं। स्वतन्त्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस ये राष्ट्रीय त्यौहार हैं। जो समाज को वात्सल्य, सद् व्यवहार, नैतिकता, धार्मिक आचरण की ओर ले जायें उन्हें सामाजिक त्यौहार कहते हैं। दशलक्षण, आष्टान्हिक आदि अध्यात्मिक पर्व हैं। धर्म 0 – भेजें
अमावस्या की घनघोर रात्रि से लड़ने वाले नन्हे दीपक हमें शिक्षा देते हैं, कि स्वयं को कमजोर न समझो, यदि सभी मिलकर ज्ञान का प्रकाश करें तो अज्ञान अन्धकार दूर हो सकता है। ज्ञान 0 – भेजें
''जैसी करनी वैसा फल, आज नहि तो निश्चित कल''। ज्ञान रुपी दीप में तप रुपी तेल भरकर, भ्रम छोड़कर आत्मा रुपी घर का अवलोकन करना चाहिए, इसके विना पहले के बैठे हुए कर्म रुपी चोर नहीं निकल सकते हैं। कर्म 0 – भेजें
मान्यताएँ भले ही अलग-अलग हैं पर दीपावली पर्व सभी जाति के लोग मनाते हैं- प्रथम मान्यता- जैन परम्परा में प्रत्यूष बेला में महावीर भगवान् को निर्वाण प्राप्त हुआ था, उसके उपलक्ष्य में लड्डू चढ़ाते हैं, उसी दिन शाम को गौतम गणधर को केवलज्ञान हुआ था, इस कारण दीप प्रज्वलित करते हैं। द्वितीय मान्यता- हिन्दु परम्परा में रावण का वध करके रामचन्द्र जी अयोध्या लौटे थे, जनता को इच्छित राजा प्राप्त हुआ था, इसलिये दीप जलाते हैं। तृतीय मान्यता- आज कृष्ण जी ने नरकासुर का वध किया था और हजारों लोगों को उसके चङ्गुल से मुक्त किया था, इसलिए दीप जलाते हैं। चतुर्थ मान्यता- इस दिन समुद्र मन्थन हुआ जिससे लक्ष्मी जी प्रकट हुयी थीं, इसलिये देवताओं ने लक्ष्मी जी की पूजा की थी। पञ्चम मान्यता- सिक्खों के अनुसार उनके छठवें गुरू हरगोविन्ददास जी ने जेल से मुक्ति पायी थी। धर्म 0 – भेजें
भगवान् पार्श्वनाथ जी वैशाख कृष्णा दूज के दिन प्राणत स्वर्ग से वाराणसी में राजा अश्वसेन-वामादेवी के गर्भ में आये, उग्रवंश में पौष कृष्णा ग्यारस को जन्म हुआ, इन्द्र ने अपने वैभव के साथ आकर पाण्डुक शिला पर अभिषेक किया, पौष कृष्णा ग्यारस पौर्वाण्ह बेला में दीक्षा ली, विमला पालकी से वन में पधारे, देवदारू वृक्ष के नीचे दो उपवास के साथ दीक्षा ली, साथ में तीन सौ राजा दीक्षित हुये, धन्यराजा के यहाँ क्षीरान्न का प्रथम आहार हुआ, धव वृक्ष के नीचे चैत्र कृष्णा त्रयोदशी को केवलज्ञान हुआ, सवा योजन का समवसरण, दस गणधर, प्रथम गणधर स्वयम्भू, प्रथम आर्यिका सुलोका, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकाएँ, मुख्य श्रोता महासेन, श्रावण शुक्ला सप्तमी को स्वर्णभद्र कूट सम्मेदशिखर जी से छत्तीस मुनिराजों के साथ एक माह तक योग निरोध कर खड्गासन से मोक्ष पधारे थे। धर्म 0 – भेजें