वैशाख शुक्ला दशमी के दिन वीर जिन को केवलज्ञान हुआ था, गणधर के अभाव में देशना नहीं खिर रही थी, तब इन्द्र का आसन कम्पित हुआ, गणधर बनने योग्य व्यक्ति को इन्द्र ने अपने अवधि नेत्र से देखा, तब इन्द्रभूति गौतम के पास जाकर प्रश्न किया- तीन काल, छह द्रव्य, नौ पदार्थ, छह जीवनिकाय, छह लेश्या, पाँच अस्तिकाय, पाँच व्रत, पाँच समिति, चार गति, पाँच ज्ञान, पाँच चारित्र, ये जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे गए हैं, इनका जो श्रद्धान करता है वह सम्यग्दृष्टि होता है। इन्द्रभूति गौतम इनका उत्तर नहीं दे सके, अहङ्कार वश महावीर भगवान् के समवसरण में आये और मानस्तम्भ को देखकर सम्यक्त्व हो गया था। धर्म 0 – भेजें
सन्तों की सेवा, पात्र को दान और सन्तान ये स्वयं करना पड़ते हैं नौकर से काम नहीं चलता है। दान 0 – भेजें
गुरू जीवन को साक्षर नहीं सार्थक बनाते हैं। जैसे पिता टीचर से बच्चे का परिचय कराता है उसी प्रकार गुरू परमात्मा से परिचय कराते हैं। भक्ति 0 – भेजें
सन्त और सैनिक को कभी सोने मत देना, सन्त सो गये तो उन्नति रुक जायेगी, सैनिक सो गये तो सुरक्षा कठिन हो जायेगी। पुरुषार्थ 0 – भेजें
तब लों तुम ध्यान हिये बरतों, तब लों श्रुत चिन्तन चित्त रतों, तब लों व्रत चारित चाहतु हों, तब लों शुभ भाव सु गाहत हों, तब लों सत्सङ्गति नित्य रहों, तब लों मम सञ्जम चित्त गहों। जब लों नहिं नाश करों अरि को, शिव नारि वरों समता धरि को।। ध्यान 0 – भेजें
अरि-मित्र महल-मसान कञ्चन-काँच निन्दन-थुतिकरण। अर्घावतारन असि प्रहारन में सदा समता धरन।। अनासक्ति 0 – भेजें