Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 361

मनुष्य के पाँच दुःख। अधिकरण।

10 सूत्र

जो पाप मन से होता है वह मन से आलोचना करने से धुल जाता है, जैसे पानी से उत्पन्न कीचड़ पानी से धुल जाता है।
कर्म
जैसी सोच वैसा जीवन मुनि को राज्य परिवार का राग हुआ तो रौद्रध्यान हो गया और सोच बदली तो केवलज्ञान हो गया।
मन
ईर्यापथ आश्रव- बन्द घर में आये अतिथि तत्काल वापस हो जाते हैं तथा दीवाल पर पत्थर फेंकने से तत्काल नीचे गिर जाता है, उसी प्रकार ईर्यापथ आस्रव में स्थिति बन्ध नहीं होता है।
कर्म
दुकान में आय व्यय होते हैं किन्तु आय अधिक और व्यय कम होता है उसी प्रकार शुभोपयोग में आस्रव-बन्ध कम और संवर-निर्जरा अधिक होते हैं।
कर्म
पच्चीस क्रियाओं में कुछ पुण्यबन्ध का कारण हैं, कुछ पाप बन्ध का कारण हैं, जैसे प्रारम्भ की पाँच क्रियायें पुण्य-पाप दोनों का कारण हैं, छः से दस तक हिंसा की प्रधानता से हैं, ग्यारह से पन्द्रह तक इन्द्रिय विषयों की प्रधानता से हैं, सोलह से बीस तक धर्माचरण से वञ्चित रखने वाली हैं, इक्कीस से पच्चीस तक उच्च धर्माचरण से गिराने वाली हैं, प्रारम्भ की क्रियाएं क्रमशः सम्यक्त्व और मिथ्यात्व को बढ़ाने वाली हैं।
कर्म
एक स्त्री पुत्रादि का राग, दूसरा पञ्च परमेष्ठी का राग, किसको छोड़ना? एक बुद्धि पूर्वक छोड़ना, दूसरा छूट जाएगा, एक आग है, दूसरा शीतल छाया है, एक का राग नरक तक ले जा सकता है सुभौम चक्रवर्ती की तरह और दूसरा सर्वार्थसिद्धि तक ले जा सकता है नकुल, सहदेव की तरह।
अनासक्ति
तन्दुलमच्छ- एक राजा ने अपने रसोइया से मांस बनवाया, लेकिन खा नहीं पाया, दो-तीन बार ऐसा होता रहा, इतने में राजा की मृत्यु हो गयी, राजा मरकर तन्दुलमच्छ बना, रसोइया राघवमच्छ बना, दोनों मरकर सातवें नरक गये।
कर्म
बड़े-बड़े धनपति मरकर अपने ही गोदामों में चूहा बन जाते हैं, अपने ही सेप्टिक टैंक के कीड़ा बन जाते हैं, अतः परिणमों को सम्भालना चाहिए।
अनासक्ति
मनुष्यों में पाँच प्रकार के दुःख- 1.गर्भ, 2.जन्म, 3.बाल, 4.युवा, 5.वृद्ध अवस्था सम्बन्धी।
विविध
तिर्यञ्चों में पाँच प्रकार के दुःख- 1.निगोद, 2.स्थावर, 3.विकलत्रय, 4.असैनीपञ्चेन्द्रिय, 5.सैनीपञ्चेन्द्रिय पर्याय सम्बन्धी।
विविध