Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 355

क्रिया। सत्य नारायण के छः पुत्र।

9 सूत्र

अजीव विशेषण से जीव छूट गया, काय विशेषण से काल द्रव्य छूट गया, अचेतन द्रव्य पाँच, कायवान द्रव्य पाँच, बहु प्रदेशी द्रव्य पाँच, अजीव तथा कायवान चार द्रव्य हैं।
ज्ञान
क्रिया- लोहे के गोले को खिसकाना क्षेत्रान्तार क्रिया है और पानी को अलग करना प्रदेशान्तर क्रिया है।
विविध
एक बार नाड़ी चलने पर चार हजार से अधिक आवलियाँ होती हैं।
विविध
सिद्ध परमेष्ठी का भी लोकान्त के लिए गमन होता है, किन्तु प्रदेशों का हलन-चलन नहीं होता है, क्रियावती शक्ति सिर्फ जीव और पुद्गल में होती है।
विविध
सत्यनारायण के छह पुत्र- ज्ञानचन्द्र, रूपचन्द्र, धर्मचन्द्र, अधर्मचन्द्र, गगनचन्द्र और कालचन्द्र छहों को पिता ने बुलाकर काम सौंपा। ज्ञानचन्द्र! तुम्हें जानने-देखने का काम है। रूपचन्द्र! तुम्हे रूप प्रदर्शन करना है। धर्मचन्द्र! जीव-पुद्गल तुम्हारे दोनों बड़े भैया हैं, उनको चलने में सहायता देना। अधर्मचन्द्र! जीव-पुद्गल चलकर आयें तो विश्राम देना। गगनचन्द्र! आवास मन्त्री है, सबको आवास देना। काल! सबको परिवर्तन करने में सहयोग देना। ज्ञानचन्द्र सबसे बड़े थे अतः मनमानी करने लगे, ज्ञायक स्वभाव से उल्टा राग-द्वेष करने लगे, इससे संसार में दुःख भोगने लगे, दुःखों से बचने के लिए अपने ज्ञायक स्वभाव में आना आवश्यक है।
ज्ञान
इन्दौर की एक मारूति जङ्गल में पकड़ी जाने वाली थी, उन्होंने देखा खतरा है इसलिये गाड़ी छोड़कर बाहर घूमने लगे, पुलिस ने पूँछा ये गाड़ी किसकी है, उन्होंने कहा हमारी नहीं हैं, तो खतरा से बच गये, इसी प्रकार हाट-हवेली हमारे नहीं हैं ऐसा मानेंगे तो कर्मबन्ध से बच जायेंगे।
अनासक्ति
जीव और पुद्गल की कुश्ती होती रहती है, जीत-हार किसी की भी हो, लेकिन हानि जीव की ही होती है।
कर्म
जीव कहता है, हे भगवन्! इन कर्म रूपी दुष्टों ने हमें बेहाल कर दिया है, जाँच हुयी तो पुद्गल कहता है, कि भगवन्! इन्होंने राग-द्वेष से कर्मों का कर्जा लिया है, वो चुका देवें तो हम चले जायेंगे।
कर्म
प्रदेश इतना छोटा होता है कि रेजर से बाल बनाया, रेजर नीचे तक आया की इतने में ऊपर के कटे वालों में असंख्यात प्रदेशों की वृद्धि हो जाती है।
विविध