Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 353

आज्ञा। उपपाद शैय्या। देवियों की उत्पत्ति।

25 सूत्र

मनुष्य प्रतिदिन आहार करता हुआ भी सङ्कल्प के कारण छठवें-सातवें गुणस्थान वाला हो सकता है, सङ्कल्प के अभाव में इन्द्र प्रतिदिन आहार नहीं करता है तो भी छठवें-सातवें गुणस्थान वाला नहीं होता है।
कर्म
उपपाद शय्या- देवों की विवृत योनि होती है, वे अन्तर्मुहूर्त में जवान हो जाते हैं, उनका स्वागत करने देव लोग खड़े रहते हैं, वाद्य यन्त्र बजते हैं, किन्तु नारकियों को इससे विपरीत उत्पन्न होते ही अपार दुःख उत्पन्न होने लगता है।
विविध
लौकान्तिक देवों की आयु सिद्धान्त सार दीपक में नौ सागर की बतलायी है।
विविध
चन्द्र इन्द्र की आयु एक पल्य एक लाख वर्ष है, सूर्य प्रतीन्द्र की आयु एक पल्य एक हजार वर्ष है एवं जम्बूद्वीप में छत्तीस ध्रुव तारे हैं।
विविध
व्यन्तरों और ज्योतिषियों में त्रायस्त्रिंश और लोकपाल नहीं होते क्योंकि त्रायस्त्रिंश और लोकपाल में उत्पन्न होने के लिये विशेष पुण्य की आवश्यकता होती है, किन्तु व्यन्तर और ज्योतिषियों में उत्पन्न होने के लिए इतने पुण्य की आवश्यकता नहीं होती है।
विविध
बारह इन्द्रों में छः दक्षिणेन्द्र एक भवावतारी होते हैं।
विविध
सोलहवें स्वर्ग के देव काम सेवन नहीं करते, किन्तु मन में काम सेवन का विकल्प आते ही तृप्ति हो जाती है।
ब्रह्मचर्य
सभी देवियों की पीत लेश्या होती है, सोलहवें स्वर्ग में देवी की पीत व देवों की शुक्ल लेश्या होती है।
विविध
देवियों की उत्पत्ति पहले-दूसरे स्वर्ग में होती है, पहले स्वर्ग की देवियाँ 3, 5, 7, 9, 11, 13, 15 वें स्वर्ग में जाती हैं और दूसरे स्वर्ग से 4, 6, 8, 10, 12, 14, 16 वें स्वर्ग में जाती हैं।
विविध
असंख्यात देव एक समय में मरते भी हैं और जन्मते भी हैं, तिर्यञ्च वहाँ जन्म लेकर देवों की संख्या पूर्ति करते हैं।
विविध
गति, शरीर, परिग्रह अभिमान दुःख के कारण हैं, और कम गमन-आगमन, शरीर के प्रति कम राग, कम परिग्रह और कम अहङ्कार ये सुख के कारण हैं।
अनासक्ति
भवनवासियों के चालीस, व्यन्तरों के बत्तीस, कल्पवासियों के चौबीस, ज्योतिषियों के सूर्य और चन्द्र, मनुष्यों का इन्द्र चक्रवर्ती एवं पशुओं का इन्द्र सिंह होता है, ये सौ इन्द्र भगवान् को नमस्कार करते हैं।
विविध
श्वेताम्बर मत- सोलहवें स्वर्ग में देवियाँ नहीं जाती, किन्तु देवों को काम की बाधा होती है तो दूसरे स्वर्ग में पहुँच जाते हैं।
विविध
श्री, ह्री आदि व्यन्तर देवियाँ हैं (उ.पु.), कुछ आचार्य इनको भवनवासिनी देवी मानते हैं।
विविध
छह सौ छप्पन योजन के क्षेत्र में जितने प्रदेश हैं उतने ज्योतिषी देव हैं।
विविध
चन्द्रमा के विमान को सोलह हजार, सूर्य के विमान को आठ हजार, ग्रह के विमान को चार हजार, नक्षत्र के विमान को दो हजार, प्रकीर्णक के विमान को एक हजार, पूर्व से दक्षिण तक बैल के मुखाकार वाले, दक्षिण से पश्चिम तक सिंह के मुखाकार वाले, पश्चिम से उत्तर तक हाथी के मुखाकार वाले, उत्तर से पूर्व तक घोड़े के मुखाकार वाले देवता हमेशा खींचते हैं।
विविध
ज्योतिषियों का गमन सुमेरू के 1121 योजन दूर से होता है, शेष ज्योतिषियों का भी इसके अन्दर गमन नहीं होता है।
विविध
सूर्य की एक सौ चौरासी गलियाँ हैं और चन्द्रमा की पन्द्रह गलियाँ हैं।
विविध
बाह्य वीथी को कर्क और मध्य वीथी को मकर कहते हैं।
विविध
चौदह जनवरी को मकर सङ्क्रान्ति, चौदह जुलाई को कर्क सङ्क्रान्ति होती है।
विविध
एक मिनिट में सूर्य छः लाख कि.मी. चलता है।
विविध
सौधर्मेन्द्र की आयु जब सोलह अङ्क प्रमाण होती है तब दो सागर होते हैं।
विविध
''सारस्वतादित्य'' इस सूत्र में च शब्द से सोलह देवों का और ग्रहण करना, जो एक दिशा में सारस्वत् आदि के बाद दो-दो भेद लेना चाहिए, 407820 कुल लौकान्तिक देव होते हैं।
विविध
सोलहवें स्वर्ग के देवों की आयु बाईस सागर की है, एवं वहाँ के त्रायस्त्रिंश व आभियोग्य जाति के देवों की आयु दस पल्य है।
विविध
स्वर्ग में तीर्थंकर बनने वाले जीव की एवं अन्य सम्यग्दृष्टि देवों की भी माला नहीं मुरझाती है, किन्तु मिथ्यादृष्टि देवों की मरण के पूर्व माला मुरझाने लगती है।
समाधि