भाव- बरसात में मेरे कपड़े गीले न हो जायें, मैं घर पहुँच जाऊँ इसके बाद खूब पानी गिरे, फिर चाहे गरीब का आटा गीला हो जाये। ट्रेन लेट हो जाये जिससे हमें मिल जाये, चाहे उसमें बैठे हजार लोग भूखे तड़फ रहे हों। इसकी कोई चिन्ता नहीं रहती। ट्रेन पर बैठे, सीट मिल गयी तो स्वयं लेट जाते हैं, चाहे दूसरे खड़े हों। हमें माल खरीदना है तो सस्ता हो जाए, और बेचना है तो महँगा हो जाए, चाहे दूसरे को कितना भी नुकसान हो जाए। हमें आवश्यकता है तो पानी बरस जाए अन्यथा नहीं बरसे भले ही दूसरे की खेती सूख जाए, वकील और डॉक्टर कभी ये भावना नहीं भा सकते कि सभी जीव सुखी रहें, अन्यथा उनकी दुकानदारी बन्द हो जाएगी। लोग भगवान् से प्रार्थना भी अपने स्वार्थ के अनुसार करते हैं ये सब भावों के भेद हैं। मन 0 – भेजें
किसी जीव में चार ज्ञान होने पर भी उपयोग एक का ही होगा जैसे एक पेन में पाँच रिफिल हैं लेकिन एक समय में एक का ही उपयोग होगा। ज्ञान 0 – भेजें
ब्राह्मण से तत्त्वार्थसूत्र जी के पहले अध्याय के 'एकादीनि भाज्यानि युगपदे कस्मिन्नाचतुर्भ्य:' सूत्र का अर्थ पूँछा तो इस प्रकार का अर्थ किया-'एक को लेकर सबको मारो और चारों दिशाओं में जहाँ रास्ता मिले भाग जाओ', इसलिये 'सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र' अर्थात् सूत्रों में नहीं दिखाई देने वाले पद की आगे-पीछे से अनुवृत्ति कर लेना चाहिए। ज्ञान 0 – भेजें
मिथ्यादृष्टि- जैसे पित्त रोगी, बहिन को माता और माता को बहिन कहता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि का तत्त्वों के विषय में अनिश्चय रहता है। विवेक 0 – भेजें
सासादन गुणस्थान में मनुष्यों की संख्या बावन करोड़, अन्य गति के जीवों की संख्या पल्य के असंख्यातवे भाग है। कर्म 0 – भेजें
अङ्गबाह्य- आरातीय आचार्यों के द्वारा जो रचना हुयी, अर्थात् आज के श्रुत को अङ्गबाह्य कहते हैं। ज्ञान 0 – भेजें
अङ्गप्रविष्ट- गणधर या अङ्ग श्रुत के धारियों के द्वारा जो रचा गया है, उसे अङ्गप्रविष्ट कहते हैं। ज्ञान 0 – भेजें
कुन्दकुद स्वामी ने सर्व विशुद्ध अधिकार लिखा, सर्वाधिकारों को सुरक्षित (पेटेंट) नहीं लिखा है। ज्ञान 0 – भेजें