Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 313

ब्रह्मचर्य से लाभ।

8 सूत्र

मात्र विवाह नहीं करना ब्रह्मचर्य नहीं है, किन्तु मैथुन का त्याग कर आत्मोपलब्धि का प्रयत्न ब्रह्मचर्य है।
ब्रह्मचर्य
मित्र को निष्कपट व्यवहार से, शत्रु को नीतिबल से, लोभी को धन से, राजा को आज्ञा पालन से, ब्राह्मण को आदर से, युवति को अत्यधिक प्रशंसा से, भाई को शान्तवृत्ति से, गुरु को नमस्कार से, मूर्ख को कथाओं से, विद्वान् को विद्याओं से, रसिक को रस से और ''सभी को ब्रह्मचर्य से वश में करना चाहिए।''
ब्रह्मचर्य
संसार में लौकिक कला और लौकिक ज्ञान की अनेक चीजें हैं, पर ब्रह्मचर्य में विरले ही निपुण हैं।
ब्रह्मचर्य
गुरु की साक्षी पूर्वक लिए हुए समस्त व्रतों का पालन करना, संसार रूप शत्रु से भयभीत मनुष्य का ब्रह्मचर्य कहलाता है।
ब्रह्मचर्य
शरीर रज-वीर्य रूपी मल से उत्पन्न हुआ है और मल को ही उत्पन्न करता है, मल को ही झराने वाला है, दुर्गंधित है, ग्लानि उत्पन्न करने वाला है, इस प्रकार शरीर को देखते हुए जो काम से विरक्त होता है, वह ब्रह्मचारी कहलाता है।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य अङ्क के तुल्य है, व्रतादिक शून्य के तुल्य हैं, ब्रह्मचर्य के नष्ट हो जाने पर व्रतादिक शून्य तुल्य हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
जो पर स्त्री में माता की तरह, परधन में मिट्टी के ढेले की तरह और प्राणी मात्र में अपने समान व्यवहार करता है वह पण्डित है।
ब्रह्मचर्य
भूमि में गया हुआ जल पवित्र होता है, पतिव्रता नारी पवित्र होती है, धर्मपरायण राजा पवित्र होता है एवं ब्रह्मचारी सदा पवित्र होता है।
ब्रह्मचर्य