धन को मौज़-शौक में कभी उपयोग न करना, रावण ने मौज़-शौक किया था जनक ने सेवा की थी, धन सदा रहेगा भी नहीं, इसलिये जितने दिन पास में हैं उसका उपयोग सेवा के लिये करो, अपने ऊपर कम खर्च करो, बाकी दुःखियों के दुःख दूर करने में व्यय करना। दान 0 – भेजें
अपनी सन्तान के लिये यही उपदेश छोड़कर जाओ, यदि बच्चे एश आराम वाले होंगे, तो पाप करेंगे और व्यापार को चौपट करेंगे ऐसे नालायकों को धन कभी न देना, हम भाइयों ने व्यापार को बढ़ाया तो यह समझकर कि वे लोग धन का सदुपयोग करेंगे। परिवार 0 – भेजें
सदा यह ध्यान रखना कि तुम्हारा यह धन जनता की धरोहर है, तुम उसे अपने स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं करना। दान 0 – भेजें
भोजन को दवा समझकर खाना जो स्वाद के वश में होकर खाते हैं, वे काम नहीं कर पाते हैं और जल्दी मर जाते हैं। आहार 0 – भेजें
स्वयं पर अनुशासन करके किसी भी विपत्ति में विकल्प की खोज कर शान्ति पाने का प्रयास करना चाहिये एवं तनाव वाली स्थिति से दूर रहकर ही जीवन का आनन्द ले सकते हैं। संयम 0 – भेजें
सोना गर्मी पाकर आभूषण बनता है और पाषाण चोट खाकर भव्य मूर्ति बनता है, उसी तरह जीवन में जितने सङ्घर्ष आते हैं, आदमी उतना ही अधिक अनुभवी एवं मूल्यवान बनता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें