Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 304

परिग्रह से हानि।

13 सूत्र

गृह आदि में ममत्व भाव रूप मूर्छा के निमित्त से आगत और उनके रक्षण आदि से सञ्चित पापकर्म की निर्जरा बड़ी कठिनता से होती है।
अनासक्ति
पर द्रव्य- 'सीता' के संयोग से राम भी दुःखी हुये, रावण की दुर्गति हुयी, कुटुम्ब परिवार का सम्बन्ध शरीर से है, आत्मा से नहीं।
अनासक्ति
ग्रहों में शनि ग्रह खतरनाक है, किन्तु उससे भी अधिक दुष्ट ग्रह परिग्रह है, यह दसवां ग्रह सब ओर से पकड़ता है।
अनासक्ति
एक लंगोटी का परिग्रह भी सोलहवें स्वर्ग से ऊपर नहीं जाने देता एवं जितना ज्यादा सङ्ग्रह होता है उतनी ज्यादा व्यग्रता होती है।
अनासक्ति
लाखों शत्रुओं से उतनी हानि नहीं होती, जितनी रागादि परिणामों से होती है।
अनासक्ति
अन्याय का धन एवं इन्द्रिय विषय ये सुमार्ग के बाधक तत्त्व हैं।
चरित्र
अज्ञान- किसी ने कहा तुम्हारी पत्नि विधवा हो गयी, वह रोने लगा, तीसरे ने सुना तो कहा आप जीवित हैं तो आपकी पत्नी विधवा कैसे हुई? इसी तरह जब तक मेरे पन तेरे पन की बुद्धि है, तब तक अज्ञान है।
ज्ञान
बाहरी त्याग के बाद भी मन में 'मैं' और 'मेरे पन' का भाव निरन्तर चलता रहता है, इसलिए आत्म शान्ति नहीं मिलती है।
अनासक्ति
भ्रान्ति टूटी- किसी व्यक्ति ने स्वप्न में देखा, मकान में आग लग गयी, दरवाजे, परदे आदि जलने लगे हैं, उस व्यक्ति के मकान को बुझाने के लिये कितने बाल्टी पानी की आवश्यकता है? अर्थात् एक बूँद की भी नहीं, मात्र उसे जगाने की आवश्यकता है, उसके जागते ही आग अपने आप बुझ जायेगी, वस्तुतः आग लगी ही कहाँ थी, भ्रान्ति टूटने की आवश्यकता थी उसी प्रकार, ये जगत भी एक सपना है, मात्र सजग होने की आवश्यकता है।
ज्ञान
मनुष्य पर्याय दुर्लभता से प्राप्त हुयी है, लेकिन अज्ञानी जन सुलभता से नष्ट कर देते हैं।
पुरुषार्थ
पेट की भूख से अधिक खतरनाक पैसे की भूख होती है, पेट की भूख व्यक्ति को मजबूर बनाती है, किन्तु पैसे की भूख मुनष्य को अतिक्रूर बनाती है।
धन
प्रशंसा की इच्छा से कोई भी कार्य शुरू करना अपने-आप को पतित करने की कला है।
विनम्रता
अणुमात्र भी परिग्रह से मोह की गाँठ दृढ़ होती है, उससे ऐसी तृष्णा बढ़ती है, जिससे संसार की समस्त भोग सामग्री भी शान्ति के लिए नहीं होती है।
अनासक्ति