दुधारु गाय भी बिना दुहे दूध नहीं देती, इसी प्रकार आत्मा में ज्ञान है किन्तु बिना अभ्यास के अपना ज्ञान प्रकट नहीं होता। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ज्ञान की जड़ कड़वी होती है पर ज्ञान का फल मीठा होता है, अत: ज्ञान प्राप्त करते समय कष्ट होता है प्राप्त हो जाने पर सुख होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
शास्त्रानुसार अपनी बुद्धि करना, बुद्धि के अनुसार शास्त्र नहीं करना, पढ़ो, समझो, आचरण में लाओ, फिर उपदेश दो। ज्ञान 0 – भेजें
जैसे बम्बई घूमकर आए व्यक्ति को सब कुछ झलकता है, दर्पण में हाथी जैसे विशाल प्राणी भी झलकते हैं, आँख की पुतली मसूर बराबर होकर भी मेरु को विषय बना लेती है, उसी प्रकार ज्ञान रूपी दर्पण में सब कुछ झलकता है। ज्ञान 0 – भेजें
राहगीर मील के पत्थर को देखकर मञ्जिल पाते हैं, साधु शास्त्र रूपी मील के पत्थर को देखकर मोक्ष मार्ग में चलते हैं। धर्म 0 – भेजें
दो प्रकार का ज्ञान-मुख का ज्ञान- 'शरीर अलग है आत्मा अलग है' पाठ कर लेते हैं। ह्रदय का ज्ञान- सुकुमाल स्वामी ने 'शरीर अलग है आत्मा अलग है' ऐसा चिन्तन करते हुए सियालनी को भगाया नहीं और सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग गए। ज्ञान 0 – भेजें
चिकित्सक बनने वाले को पढ़ाई के लिये चौबीस घण्टे कम पढ़ते हैं, तब कुशल चिकित्सक बनता है उसी प्रकार दस मिनिट स्वध्याय करने वाले कुशल आत्मज्ञ कैसे बन सकते हैं? पुरुषार्थ 0 – भेजें
गणेश प्रसाद वर्णीजी ने धर्म माता चिरोंजाबाई जी से कहा! हम शास्त्रपढ़ने नहीं जायेंगे, कुछ लोग आते हैं सोते रहते हैं, बाई जी ने कहा सारा कुँआ छानलोगे तो जिवानी कहाँ डालोगे? सभी लोग मोक्ष जानेवाले नहीं हैं, एक का भी कल्याण होता है, तो अच्छा है। धर्म 0 – भेजें
विद्यालय एक मन्दिर है, सरस्वती वहाँ की देवी है, शिक्षक पुजारी है, विद्यार्थी भक्त हैं, अत: विद्यालय शुद्ध और व्यसन मुक्त होकर जाना चाहिए, चप्पल पहनकर गुटका खाकर विद्यालय में प्रवेश नहीं करना चाहिए। ज्ञान 0 – भेजें