Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 286

लोग माल उड़ा कर भी बुरा...।

5 सूत्र

रामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मण के साथ वन-वन भटकते हुए एक ऐसे महा एकान्त वन में आये, जहाँ राम-लक्ष्मण और सीता ने स्नान पूर्वक शुद्धि से भोजन तैयार किया और पड़गाहन के लिए बाहर खड़े हुए, तो सीता ने आकाश मार्ग से चारण ऋद्धिधारी दो मुनि आते हुए देखे, राम-सीता ने उनका पड़गाहन कर नवधाभक्ति पूर्वक निरन्तराय आहारदान दिया, वहाँ एक वृक्ष पर गिद्ध पक्षी (जटायु) बैठा था, आहार चर्या देख उसको जातिस्मरण हो गया, महामुनि के दर्शनार्थ वृक्ष से नीचे आया, मुनियों के गन्धोदक के प्रभाव से उसका शरीर महाकान्ति से युक्त हो गया और भक्ति करता हुआ मुनि के आगे नाचने लगा तथा पाप से डरकर श्रावक के व्रत ग्रहण किये और व्रती बना।
दान
सेठ ने धीवर को एक रुपये का दान दिया, उसने जाल खरीद कर मछली मारना शुरू कर दिया, सेठ कङ्गाल हो गया, मुनि से पूँछा तो उन्होंने कहा, तुमने धीवर को दान दिया है, जिससे ऐसा हुआ।
दान
दान से अच्छा कोई धर्म नहीं- कञ्जूस सेठ धर्म कर्म से दूर रहता था, पत्नि धार्मिक थी, एक बार नगर में सन्त आये, दान पर प्रभावी प्रवचन हुआ, सेठजी भी प्रवचन सुनने गये थे, पत्नि ने पूँछा प्रवचन अच्छा लगा? सेठ ने कहा आज के प्रवचन का सार यह है कि दान से अच्छा कोई धर्म नहीं, इसलिये कल से दान माँगने का कार्य प्रारम्भ करूँगा।
दान
राजकुमार के खजाने में साँप रहता था, कोषाध्यक्ष और मन्त्री को देखकर फुङ्कार मारता था, लेकिन राजकुमार को देखकर हट जाता था, वह राजकुमार के पिता का जीव था, राजा परिग्रह आसक्ति के कारण अपने ही भण्डार में मरकर सर्प बना था, मुनिराज के मुख से पिता के पूर्व भव सुनकर राजकुमार को वैराग्य हो गया।
अनासक्ति
लोग माल उड़ाकर भी बुरा कहते हैं- एक सेठ के चार बेटे थे, उसने पाँच-पाँच लाख रुपए सबको बराबर बाँट दिये, बेटों ने सोचा समाज का मुख मीठा कर दो, छोटे बेटे ने अच्छी नमकीन-मिठाईयाँ खिलाई, खा-पीकर लोग चर्चा करने लगे, बाप का धन तो इसी ने उड़ाया है, तभी तो इतना खर्च कर रहा है, लोग माल भी उड़ा रहे थे और बुराई भी कर रहे थे, दूसरे बेटे ने केवल मिठाई बनायी, खा-पीकर लोग बोले ये तो बदमाश है, तीसरे ने पूड़ी-साग खिलाई तो लोगों ने कहा कञ्जूस है, चौथे ने दाल-रोटी खिलाई तो लोग बोले कि मक्खीचूस है, इसलिए इस जगत में प्रशंसा की दृष्टि से खर्च करना व्यर्थ है क्योंकि महावीर भगवान् की भी सब प्रशंसा नहीं करते हैं।
संगति