Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 277

आहार दान का दाता।

7 सूत्र

घर पर शत्रु के आने पर भी सज्जन लोग मिष्ट वचन आसन आदि के द्वारा सम्मान करते हैं, फिर गुणों के भण्डार साधु के आने पर सज्जन लोग क्या नहीं करते हैं?
दान
मिथ्यादृष्टि की भी आहार दान में रुचि होती है दान की अनुमोदना से पशु भी भोगभूमि में जाता है, वहाँ पर कल्पवृक्ष सदा मनोरथों को पूर्ण करते हैं, फिर सम्यग्दृष्टि के कौन से मनोरथ पूर्ण नहीं होंगे अर्थात् सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं?
दान
सेठ की सम्पत्ति बीस हजार- धनी सेठ से साधु ने पूँछा तुम्हारी कितनी सम्पति है सेठ ने कहा बीस हजार क्योंकि हमने इतना ही दान दिया है, बाकी की सम्पत्ति परिवार की है, अर्थात् जितना दान देते हैं उतना ही अपना मानना चाहिए।
दान
आहार का दाता- इस अवसर्पिणी में दान तीर्थ के कर्ता राजा श्रेयाँस हुये, जिनकी यश चन्द्रिका लोक में फैली है, तीर्थंङ्कर या ऋद्धिधारी मुनि को आहार देने से पञ्चाश्चर्य होते हैं, तीर्थंङ्कर का प्रथम आहारदाता तद्भव मोक्षगामी होता है, राजा श्रेयाँस का दस भव पूर्व का संस्कार था, भरत चक्रवर्ती राजा श्रेयाँस के दर्शनार्थ आये, छेवले के वृक्ष के नीचे राजा श्रेयाँस का सम्मान किया था, उसी दिन से अक्षय तृतीया पर्व प्रारम्भ हुआ था।
दान
अतिथि को खिलाकर खाओंगे तो वह भोजन भी पूजन बन जायेगी, अर्जन के साथ विसर्जन जरूरी है।
दान
दान तो हजार गुणा होकर लौटता है, इतना दान भी मत करो कि किराये के मकान में रहना पड़े और इतना सङ्ग्रह भी मत करो कि नरक जाना पड़े।
दान
त्याग से नदी पार- एक साधु को नदी पार करना थी, नाविक ने पाँच रुपये माँगे, साधु ने कहा नहीं हैं, तभी एक व्यक्ति आया, उसने सोचा इनको भी पार करा देते हैं, नदी के बीच में साधु से व्यक्ति ने कहा, आप त्याग का बहुत उपदेश देते हो, अब मत देना, साधु ने कहा भैया जब पाँच रुपये का त्याग किया तभी तो नदी पार हुये, उसी प्रकार जब तक सम्पूर्ण त्याग नहीं करेंगे, तब तक संसार सागर से पार नहीं हो सकते हैं।
अनासक्ति