Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 241

अपनी सुरक्षा। मौनं सर्वार्थ साधनं।

29 सूत्र

पिता से प्रश्न- बादशाह ने सोचा जब बीरबल इतना चतुर है तो बीरबल के पिता कितने चतुर होगें? बीरबल से कहा कि कल तुम अपने पिता को सभा में लाना। सभा में गये, बादशाह ने प्रश्न किया– दो लोगों में झगड़ा हो गया हो तो क्या करना चाहिये? वे मौन रहे, दो दिन बाद बीरबल सभा में आये, तब बादशाह ने कहा तुम्हारे पिता जी बड़े मूर्ख हैं, बीरबल ने कहा हमारे पिताजी ने भी यही कहा था, कि तुम्हारे बादशाह बड़े मूर्ख हैं, हमने उनके प्रश्न का उत्तर दिया, लेकिन वो समझे नहीं, दो लोगों में झगड़ा हो तो मौन रहना चाहिए, बादशाह बीरबल की बात को सुनकर शर्मिन्दा हो गये।
वाणी
अपनी सुरक्षा- अमेरिका का एक व्यापारी हेनरी फोर्ड हीरे–जवाहरात लेकर दूसरे देश जा रहा था। रास्ते में गाड़ी खराब हो गयी, तो ट्रेन से गया, तब टी.टी. ने टिकिट पूँछा तो मौन रहे, टी.टी. ने उनको पुलिस के हवाले कर दिया, सुबह अधिकारी को टिकिट बता दिया, अधिकारी ने पूँछा कि आपने रात को टी.टी. के लिए टिकट क्यों नहीं बताया, तब हेनरी बोले कि रात को मेरी सुरक्षा हो गयी, अन्यथा में अपना माल कहाँ सुरक्षित रखता, इसी प्रकार आत्मा की सुरक्षा मौन से होती है।
संयम
मौन के वृक्ष पर शान्ति के फल लगते हैं, मौन निद्रा के समान है यह ज्ञान में नई स्फूर्ति पैदा करता है।
संयम
चुप रहो तो ऐसे जैसे सामयिक कर रहे हो और खाओ तो ऐसे जैसे दवा खा रहे हो।
संयम
मौनं सर्वार्थ साधनं- सात मील चलने में जितनी शक्ति क्षीण होती है, उतनी एक घण्टे बोलने में क्षीण हो जाती है।
संयम
मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक शक्ति होती है, मौन रहो और अपनी सुरक्षा करो।
संयम
मौन को ही अज्ञानता का ढक्कन बताया है इसमें और भी अनेक गुण हैं।
संयम
मौन अभिमान का रक्षक है, ज्ञान का साधन है, पुण्य को करने वाला है, पाप को हरने वाला है, देवादि को वश में करने वाला है, क्रोध को हरने वाला है, मन की शुद्धि और सुख को करने वाला है।
संयम
मौन रखने से संसार का आधा सम्बन्ध छूट जाता है।
संयम
मौन और एकान्त ये दो आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं, मौन से आत्म साधना में बल मिलता है।
ध्यान
मौन आत्म प्रशंसा व पर निन्दा से बचाता है, मौन से आन्तरिक शान्ति एवं एकाग्रता प्राप्त होती है।
संयम
विना मौन के साथ की गई साधना से मौन के साथ की गई साधना कई गुणी फलदायी होती है।
संयम
मौन अन्तर विकारों को जीतने का प्रमुख साधन है, शान्ति व एकाग्रता के क्षणों में अपरिमित शक्ति प्रकट होती है।
संयम
मौन से आन्तरिक क्लेशों का विनाश होता है, एवं विवेक प्राप्त होता है व चुप रहने से पछताना नहीं पड़ता है।
संयम
मौन द्वारा क्रोध के क्षणों को टालकर शान्ति के क्षणों में समस्या का सही समाधान खोजा जा सकता है।
क्षमा
परिषह जय भी मौन की साधना से ही शोभा पाता है।
संयम
मौन का स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक पक्ष तो सबल एवं सामर्थ्यवान है ही, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, पर्यावरणीय सौन्दर्य एवं नैतिक सम्बन्धों में भी मौन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।
संयम
मौन आने वाले विघ्नों को हरने वाला है, मित्रता को करने वाला है, विवाद को हरने वाला है, रत्नत्रय का संरक्षण करने वाला है और समय पर अज्ञान का नाश करने वाला भी है।
संयम
विद्वान् को अर्थपति, खजाञ्ची, राजा, अपने से अधिक विद्वान्, अधिक तपस्वी, बहुसङ्ख्या में उपस्थित मूर्ख, शत्रु तथा गुरुओं को उत्तर नहीं देना चाहिए अर्थात् उनकी डाँट को चुपचाप सहन कर लेना चाहिए।
विनम्रता
ज्यादा बोलना लघुता उत्पन्न करता है और मौन उन्नति का कारण है, आबाज के कारण पायल को पैरों में रखा जाता है और चुप रहने से हार गले में सुशोभित होता है।
वाणी
मौनव्रत के फल से नर–नारी इस जन्म में सुखी होते हैं और नर परभव में मोक्ष को तथा स्त्री पुरुषत्व को प्राप्त होती है।
संयम
माता, पिता, स्त्री, भाई, बहिन, पुत्र, बालक, बीमार, आचार्य, अतिथि, तपस्वी, वृद्ध, वैद्य, हिस्सेदार, सेवक, आश्रित रहने वाले सम्बन्धी तथा मित्रों के साथ सदा वचन कलह न करने वाला मनुष्य तीनों जगत को जीत सकता है।
वाणी
हँस की सभा में बगुला और कोयल की सभा में कौआ जब तक मौन रहता है तब तक सम्मान पाता है।
वाणी
बोलना कला है, मौन रहना उससे भी ऊँची कला है, ज्ञानियों की सभा में मौन अज्ञानियों का आभूषण है।
वाणी
चींटी से अच्छा उपदेश कोई नहीं देता, वह सदा मौन रहती है, अपना काम करती है।
संयम
भय से उत्पन्न मौन भीरुता और संयम से उत्पन्न मौन साधुता उत्पन्न करता है।
संयम
मौन पवित्रतम विचारों का देवालय है।
संयम
मौन निद्रा की तरह चैन देता है, मौन तुम्हारे साथ कभी विश्वास घात नहीं करता है।
संयम
साधु, चोर, पापी, पुण्यवान, ईमानदार, बेईमान, धनी, निर्धनी, अनपढ़, गुणवान, भ्रष्ट, शीलवान, मूर्ख, ज्ञानी ''मौन'' कोई भी रह सकता है, सभी के काम, क्रोध, निन्दा कम होकर नियन्त्रित होते हैं।
संयम