Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 235

मैं पर धन कभी नहीं लेता।

9 सूत्र

प्रिय और सार्थक, प्राणीमात्र की हितकारी वाणी बोलनी चाहिए तथा शाश्वत् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की सिद्धि के लिए मौन रहना चाहिए।
वाणी
लक्ष्मी, मित्र, बान्धव, बन्धन और मरण सभी जिव्हा के अग्र भाग में बसते हैं, जिस तरह जिव्हा का उपयोग करोगे वैसा ही फल मिलेगा।
वाणी
वाणी ऐसी बोलिए, मन का आपा खोय। औरों को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।
वाणी
पर की निन्दा सरल है, कठिन स्वयं की जान। जो अपनी निन्दा करे, जग में वही महान।।
विनम्रता
अन्धे को अन्धा कहो, तुरतई पड़ है टूट। धीरे–धीरे पूँछ लो, कैसे गयी है फूट।।
वाणी
तुम बोलो या न बोलो इस बात का गम नहीं है। तुम मुस्कुराकर देख लो, यह भी बोलने से कम नहीं है।।
वाणी
गाली आवत एक है, जावत होत अनेक। जो गाली फेरे नहीं, रहे एक की एक।।
क्षमा
वचन में चतुराई- राजा ने हाथी की रक्षा महावत को सौंपी और कहा कि हाथी को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति राजा को हाथी की मृत्यु का समाचार देगा, उसको मृत्यु दण्ड होगा, कुछ दिन बाद हाथी मर गया, अब कौन राजा से कहे, सब सङ्कट में थे, एक वृद्ध ने जाकर कहा राजन! आज हाथी की विलक्षण दशा है, भोजन बन्द, स्पन्दन बन्द है, स्वर्गवास हो गया, राजा ने कहा हाथी मर गया? वृद्ध ने कहा! हमने मरना कहाँ कहा।
वाणी
मैं परधन कभी नहीं लेता- रिक्शा में सेठ का पैसों का थैला छूट गया, वह सेठ को लौटाने के लिये होटल में आया, सेठ ने उसे पाँच हजार रुपये पुरस्कार में देना चाहे पर उसने नहीं लिये और कह दिया मैंने टेक्सी का किराया ले लिया है, विना मेहनत के पराई कमाई नहीं लेता हूँ, ये सत्य व्यवहार है।
सत्य