Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 233

बांसुरी की विशेषता।

30 सूत्र

बोल उठे अवसर विना, ता को रहे न मान। जैसे कार्तिक बरसते, निन्दे सकल जहान।।
वाणी
बहु सुनवो कम बोलवो, यो है चतुर सुजान। इसीलिये विधि ने रची, एक जीभ दो कान।।
वाणी
वाणी से ही गधे पर बैठाया जाता है, वाणी से ही हाथी पर बैठाया जाता है।
वाणी
एक वचनकला ही पूर्ण कला है, अन्य कलाओं से क्या प्रयोजन है, हजारों वृद्ध गायों से एक कामधेनु का होना अच्छा है।
वाणी
कम बुद्धिमान ज्यादा बोलता है, ज्यादा बुद्धिमान कम बोलता है।
वाणी
तुम मत बोलो काम को बोलने दो, प्रभावपूर्ण बोलना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
वाणी
'क्यों रे', 'तू क्या कर रहा है', इत्यादि ग्रामीण भाषा बोलने वाले व्यक्ति के वचन असत्य की कोटि में आते हैं।
वाणी
घड़े और नारियल की कीमत आवाज से होती है, अतः अच्छे शब्द बोलने में दरिद्रता नहीं होना चाहिए।
वाणी
एक हीरा सैकड़ों काँच के टुकड़ों को मात कर देता है, उसी प्रकार कठोर शब्द काँच हैं और मीठे शब्द हीरे हैं।
वाणी
अनुभवी फालतु बात नहीं हित की बात करता है।
वाणी
जिसका मन वश में होगा उसका वचन भी वश में होगा, अतः वचन को वश में करने के लिए मन को वश में करना चाहिए।
संयम
मूर्ख गप्पों से, विद्वान सत्य से, अहङ्कारी प्रणाम से प्रभावित होता है।
वाणी
असत्य से इस लोक में अपमान और परलोक में दुर्गति व सत्य से इस लोक में सम्मान और परलोक में सद्गति की प्राप्ति होती है।
सत्य
जिसका हृदय कोमल है, उसकी वाणी कड़वी कैसे हो सकती है, पर जिसकी वाणी मीठी हो उसका हृदय निर्मल हो यह जरूरी नहीं है।
वाणी
मौन- आत्म हित की साधना में मौन सहायक है वार्तालाप नहीं, असत्य बोलने की तरह असत्य सुनने से भी पाप होता है अतः यत्न पूर्वक बचन बोलना चाहिए।
वाणी
वाणी के संस्कार में अन्तर–ये मेरे बाप की लुगाई है, ये मेरी जननी/माँ हैं।
वाणी
बाँसुरी की विशेषता–विना बुलाये नहीं बोलती, जब भी बोलती है तो मीठा बोलती है, भीतर बाहर से गाँठ रहित होती है।
वाणी
राजा दशरथ ने सत्य को निभाया, राम ने सत्य वचन का पालन किया विभीषण ने सत्य को पकड़ा, रावण ने सत्य को छोड़ा था।
सत्य
वाणी को अश्व की तरह बाँध कर रखना चाहिए, अन्यथा किसी भी विपत्ति रुपी गड्ढे में गिरा देती है।
वाणी
वाणी बोलकर अपने को, और सुनकर श्रोता को आनन्द की प्राप्ति नहीं हुयी तो बोलने का श्रम व्यर्थ है।
वाणी
बोलने के लिए सिर्फ वाणी की जरूरत होती है, किन्तु चुप रहने के लिये वाणी और विवेक दोनों की जरूरत पड़ती है।
वाणी
मन्त्र के शब्दों से सर्प, बिच्छु आदि के जहर तक उतर जाते हैं।
णमोकार
अपमान के वचन से भूख–प्यास ख़त्म हो जाती है और सम्मान पूर्ण वचन से भूख खुल जाती है।
वाणी
जो मूर्च्छा में जीता है वह मूर्ख है और जो होश में जीता है वह होशियार है।
विवेक
आपके सम्बोधन अच्छे होंगे तो आपके सम्बन्ध अच्छे होंगे।
वाणी
सम्यग्दृष्टि उपगूहन अङ्ग का पालन करता है, पैशून्य (चुगली या निन्दा) नहीं करता है।
वाणी
सत्य व्रत की पाँच भावना- क्रोध, लोभ, भय हास्य का त्याग एवं आगम के अनुसार कथन ये सत्य व्रत की पाँच भावनाएं हैं।
सत्य
अगर मात्र एक उपाय से जगत को अपने बस में करना चाहते हो तो अपनी वाणी रूपी गाय को पर की निन्दा रूपी धान मत चरने दो।
वाणी
सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य न बोलो और प्रिय असत्य भी न बोलो यह शाश्वत धर्म है।
सत्य
प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी सन्तुष्ट होते हैं, इसलिए प्रिय वचन ही बोलना चाहिए। अतः वचनों में दरिद्रता नहीं होना चाहिए।
वाणी