सेठ की सत्यता- व्यापार हेतु एक सेठ जङ्गल से गुजर रहा था। डांकुओं ने उसे पकड़ लिया सब धन छीन लेने के बाद भी पाँचसौ स्वर्ण मुद्राओं को और माँगा, सेठ ने पत्र लिखा और कहा कि आप इस पत्र को ले जाओ हमारे बेटे से पाँच सौ स्वर्ण मुद्रायें ले आओ। एक व्यक्ति पत्र लेकर गया। उसके बेटे ने पाँचसौ स्वर्ण मुद्रायें दे दी। सभी डाकू प्रसन्न थे लेकिन सेठ उदासीन था, मेरे बेटे ने नकली मुद्रायें दे दी हैं, सेठ पुनः पत्र लिख कर देता है, और डाकुओं से कहता है! असली मुद्रायें ले आओ नहीं तो हमारे ऊपर से विश्वास उठ जायेगा। सेठ की सत्य निष्ठासे डाकुओं का जीवन परिवर्तित हो गया। सत्य 0 – भेजें
गाँधी जी के सत्य के प्रयोग- गाँधीजी अफ्रीका में चोरी की पैरवी कर रहे थे, उन्हे पता चला कि ये व्यक्ति झूठ बोल रहा है, गाँधीजी ने उस केस को कैंसल कर दिया, उसने गाँधीजी को मनाया तब गाँधीजी ने कहा तुम सत्य बोलो उसने सत्य बोला, मजिस्ट्रेट ने सत्य से प्रसन्न होकर दूना जुर्माना करके छोड़ दिया। सत्य 0 – भेजें
जब से खड़ा हूँ तब से कोई नहीं निकला- जङ्गल में साधु ध्यान कर रहे थे, तभी एक हिरन दौड़ता हुआ निकला, साधु का ध्यान बटा, उन्होंने देखा कि यह तो सताया हुआ है, अगर शिकारी ने आकर पूँछा तो क्या होगा, ऐसा सोच ही रहे थे कि शिकारी आ गया, साधु तत्काल खड़े हो गये जैसे ही शिकारी ने पूँछा कि यहाँ से कोई हिरन निकला है? तो साधु ने कहा जब से मैं खडा हूँ, तब से कोई नहीं निकला। जब हिरण निकला था तब साधु बैठे हुये थे, अर्थात् युक्ति पूर्वक जीव की रक्षा की और अपने सत्यधर्म की रक्षा की। अहिंसा 0 – भेजें
शिकारी ने हाथ में जिंदा चिड़िया लेकर साधु से पूछा ये मरी है या जिन्दा? साधु ने कहा मरी है, वहाँ साधु का अभिप्राय झूठ बोलने का नहीं था चिड़िया के प्राण बचाने का था इसलिए झूठ होते हुए भी सत्य है। अहिंसा 0 – भेजें
मैं चोर हूँ- एक चोर ने झूठ बोलने का त्याग किया, राजमहल में चोरी करने गया पहरेदार ने पूँछा! कौन हो? कहा! चोर हूँ, किसी ने विश्वास नहीं किया, सोचा कोई राजपुरुष होगा, जब वह चोरी करके ले जा रहा था तब पूँछा क्या ले जा रहे हो? तो उसने कहा चोरी करके ले जा रहा हूँ, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा, चोर स्वयं विरक्त हो गया, कि एक पाप के त्याग से इतना लाभ हुआ, तब सारे पापों का त्याग करेंगे तो कितना लाभ होगा? सत्य 0 – भेजें