Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 201

माया से हानि।

14 सूत्र

बाँस की जड़ की तरह वक्रता(टेढ़ापन) जीव को नरकगति में, भेड़ के सींग की तरह वक्रता जीव को पशुगति में, बैल की पैशाब की तरह वक्रता मनुष्यगति में और खुरपी की तरह वक्रता जीव को देवगति में ले जाती है।
चरित्र
हमने पानी नहीं बेंचा- एक किसान के खेत में कुंआ था, उसने खेत बेच दिया कुछ दिन बाद वह खरीदने वाले को परेशान करने लगा कि हमने खेत और कुंआ बेचा है पानी नहीं बेचा, उसने परेशान होकर कहा कि आपका पानी हमारे कुँए में रहा, अब तुम किराया दो और अपना पानी ले जाओ, और हमारे खेत में एक बून्द भी पानी गिरना नही चाहिए, तब उसने क्षमा माँगी।
चरित्र
श्री कृष्णजी का नेमिनाथजी के साथ छल- श्री कृष्णजी को यह चिन्ता थी, कि कहीं नेमिनाथजी हमारा राज न लेलें, इसलिए छल पूर्वक शादी रचवायी और पशुओं का बन्धन कराया जिसे देखकर श्री नेमिनाथजी ने वैराग्य धारण कर लिया था।
चरित्र
रानी ने जहर पिलाया- राजा यशोधर की रानी अमृतमति कुबड़े नौकर पर मोहित थी, जब राजा को मालूम हुआ तो उसे वैराग्य हो गया। रानी रोने का स्वांग करने लगी, रानी ने कहा आप दीक्षा के पहले एक बार मेरे हाथ का भोजन कर लो, भोजन में जहर मिला दिया, राजा मर गया।
चरित्र
सेठ मरकर मेढक बना- सेठ ने संकल्प किया कि, जब तक दीपक जलेगा तब तक सामायिक करेंगे, सेठ को प्यास की बाधा हुयी, इसी बीच सेठानी ने दीपक में पुनः तैल डाल दिया, सेठ आर्तध्यान से मरण कर मेंढक बना।
चरित्र
इञ्जीनियर की सलाह- रिटायर्ड इञ्जीनियर से अनुभव पूँछे, उसने कहा जिस पुल का निर्माण करो उस पर अपना वाहन न चलाओ जिस छत को बनाओ उसके नीचे कभी मत सोओ।
चरित्र
ओवर ड्यूटी-यदि दो दिन ड्यूटी पर नहीं जाता तो सरकार से पैसा कम नहीं लेता, यदि दो घण्टा ओवर ड्यूटी करता है तो उसका पैसा लेता है।
चरित्र
माया नचाती है, यदि माया से बचना है तो प्रभु कीर्तन करो, कीर्तन का उल्टा नर्तकी होता है।
चरित्र
कुटिलता का स्वभाव- एक किसान ने खेत की मेड़ पर आम, नीबू, नीम के तीन वृक्ष लगाये धूप, पानी, खाद सबको एक जैसा मिला फिर भी वह खट्टा, मीठा, कड़वा बना, किसी ने भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ा।
प्रकृति
चार प्रकार के लोग- 1.किशमिश की तरह बाहर भीतर से कोमल जीव देवगति को प्राप्त होते हैं। 2.नारियल की तरह बाहर से कठोर अन्दर से कोमल जीव मनुष्यगति को प्राप्त होते हैं। 3.बेर की तरह बाहर से कोमल अन्दर से कठोर जीव तिर्यंचगति को प्राप्त होते हैं। 4.छुहारे की तरह बाहर भीतर से कठोर जीव नरकगति को प्राप्त होते हैं।
चरित्र
सज्जनों के मन वचन काय में एकता होती है, और दुर्जनों के मन में कुछ वचन में कुछ और काय में कुछ होता है।
चरित्र
वनविहार में रामचन्द्र जी लक्ष्मण से कहते हैं! सरोवर में बगुले को देखो कितना धार्मिक है, जीव मर न जाए इसलिए धीरे-धीरे पैर रख रहा है, मछली कहती है- हे राम! बगुले की प्रशंसा क्यों करते हो, इसने तो हमारे वंश का ही विनाश कर दिया है, आप नहीं जानते सहवासी की चेष्टा को सहवासी ही जनता है।
चरित्र
उपाध्याय, बहुरूपिया, धूर्त और वेश्या इनसे मायाचारी नहीं करना चाहिए क्योंकि माया को इन्होंने ही बनाया है।
चरित्र
ऐसी कौनसी दृष्टि है जिसमें दोष नहीं है? ऐसी कौन सी दिशा है जिसमें दुःख नहीं है? ऐसी कौनसी प्रजा है जहाँ भेद-भाव नहीं है? और ऐसी कौनसी क्रिया है जिसमें मायाचारी नहीं है? अर्थात् लोक व्यवहार में प्रायः मायाचारी होती है।
चरित्र