Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 194

हमारे हाथ अर्थी के बाहर।

5 सूत्र

ज्ञान मद- बनारस से पढ़कर आया युवक नाव पर सवार होकर स्वगृह की ओर जाते हुये नाविक से पूँछने लगा 'आपने इंग्लिश पढ़ी है'? नाविक ने कहा 'नहीं', युवक ने कहा 'तब तुम्हारी पच्चीस प्रतिशत जिन्दगी बेकार' है, युवक ने पुनः पूँछा 'आपने संस्कृत पढ़ी है?' नाविक ने कहा 'नहीं', युवक बोला 'तब तो तुम्हारी पचास प्रतिशत जिन्दगी बेकार' है, नाव आगे बढ़ी तूफान आया, नाविक ने पूँछा 'आप तैरना जानते हो?', युवक ने कहा 'नहीं', नाविक बोला 'तब तो आपकी सौ प्रतिशत जिन्दगी बेकार है', इसलिये किसी भी विद्या का अहङ्कार नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
अहङ्कार रुपी लङ्गर नही खोला- भूले भटके शराबी रात भर नाव खेते रहे किन्तु सुबह देखा तो वहीं थे, नाविक ने कहा नाव का लङ्गर नहीं खोला, अतः आगे नहीं बढ़े, इसी तरह मानव ने अहङ्कार रूपी लङ्गर नहीं खोला, इसलिए संसार में ही भटक रहा है।
विनम्रता
मन्दिर बनाने का मान नहीं- हस्तिनापुर में एक सेठ ने मन्दिर बनवाया, जब मन्दिर पूरा बन गया एवं कुछ काम और शेष था, तब सेठजी ने समाज की एक बैठक बुलाई और समाज से कहा कि अब इस मन्दिर का काम पूरी समाज को पूर्ण करना है, आगे मेरी शक्ति नहीं है, पूरा मन्दिर बनवाने के बाद विनाअहम् के मन्दिर समाज को सौंप दिया उस मन्दिर में सेठजी का कहीं पर नाम भी नहीं है, यह मान कषाय के मर्दन करने का तरीका है।
विनम्रता
रुपमद- लक्ष्मीमती नामक एक कन्या रूप गुण का मानों भण्डार ही थी उसने मुनिराज के मलिन शरीर को देखकर भक्ति तो नहीं की किन्तु निन्दा करने लगी, इतना ही नहीं रूप के घमण्ड वश मुनिराज के शरीर पर थूँक भी दिया। इस घोर पाप के फल से उसके शरीर में सात दिन के बाद उदुम्बर कुष्ट हो गया, उसके घृणित शरीर में कीड़े पड़ गये, आर्तध्यान से मरण कर तिर्यञ्चयोनी को प्राप्त हुयी। कई भवों के बाद वह दरिद्रा नाम की एक कन्या हुयी, पाप के उदय से उसके शरीर से बदबू आती थी, उसको कोई अपने पास रखने को तैयार नहीं था, तब नगर के बाहर एक नदी के पास छोड़ दिया, वहाँ से मुनिराज का विहार हुआ उनके दर्शन करके अपने दुःखों के अन्त होने का उपाय पूँछा, महाराज ने धर्मोपदेश दिया पूर्व भवों के दुष्कृत का वर्णन किया, जिसे सुनकर उसे पश्चात्ताप हुआ, एवं अहिंसादि व्रतों के पालन करने का नियम लिया, जिसके फल से अगले भव में श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मणी हुई।
विनम्रता
हमारे हाथ अर्थी के बाहर कर देना- बड़े-बड़े राजा महाराजाओं को भी धर्म की शरण लेना पड़ती है। जब सम्राट सिकन्दर दक्षिण भारत की यात्रा पर आने लगा, तब अपनी माँ से आशीर्वाद लेकर निकला और माँ से कहता है, हे माता श्री! आपकी कोई इच्छा तो नहीं है? माँ ने कहा बेटा अपने देश में दिगम्बर साधुओं के दर्शन दुर्लभ हैं, इसलिये तुम भारत से दिगम्बर साधु को जरूर लाना। सिकन्दर अपनी यात्रा पूर्ण होने के बाद जब स्वदेश को लौटने लगा तो माँ की बात याद आयी, तब सिकन्दर ने अपने डेरे से एक दूत को दिगम्बर साधु के पास भेजा। दूत ने कहा महाराज हमारे सम्राट ने आपको बुलाया है, मुनि ने कहा हे पथिक! ये बताओ प्यासा कुंए के पास जाता है या कुंआ प्यासे के पास जाता है? मुनिराज के वचन सुनकर दूत सिकन्दर के पास वापस जाता है, और समाचार सिकन्दर को देता है। सिकन्दर शर्मिन्दा होता हुआ मुनि के पास जाकर सविनय निवेदन करता है, हे भगवन्! आप हमारे राज्य को पवित्र करने का कष्ट करें। मुनि ने चलने का मानस बना लिया, किन्तु मुनिराज ने निमित्त ज्ञान से ये जान लिया कि सिकन्दर का जीवन मात्र अन्तर्मुहूर्त का है। सिकन्दर अपने जीवन का अन्त समय सुनकर दुःखी होकर बोला भगवन्! मुझे बचा लिजिये। महाराज ने कहा हे राजन! मणी मन्त्र तन्त्र बहु होई मरते न बचावे कोई। सिकन्दर ने मन्त्री से कहा चाहे मेरा कोई आधा राज्य लेले, पर मुझे बचाले, बहुत ही प्रयास किया लेकिन जब कोई नहीं मिला, तो सिकन्दर कहता है जब मेरी अर्थी निकाली जाय, तब मेरे दोनों हाथ अर्थी के बाहर निकाल देना, ताकि लोगों को ये पता चल सके, कि जिस सिकन्दर ने सारी उम्र बहुत धन लूटा पर अन्तिम समय हाँथ खाली थे। सभी सङ्ग में दौलत, सभी हाली हवाली थे। सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।।
अनासक्ति