Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 184

मार्दव धर्म-अहं का विसर्जन अर्ह का सर्जन।

22 सूत्र

मान कषाय को चार गति का कारण कहा है- पत्थर की तरह मान नरकगतिका कारण है, हड्डी की तरह मान तिर्यंचगति का कारण है, लकड़ी की तरह मान मनुष्यगति का कारण है और हरे वेंत की तरह मान देवगति का कारण है।
विनम्रता
बल का मान कियो रावण ने, सोने की लंका नशानी। तन का मान किया दुर्योधन ने, मिट्टी में मिल गई जवानी।। तप का मान कमठ ने कीना, नरक की राह दिखानी। ज्ञान का मान किया गौतम ने, झुकने पड़ो ऋषिज्ञानी।। दान का मान कियो बलि राजा, पीठ पड़ी नपवानी। काहु को मान रहो न पुजारी, काहे करे लघु प्राणी।।
विनम्रता
राजा की आज्ञा का भङ्ग करना, पूज्य पुरुषों का अपमान करना और स्त्रियों की पृथक् शैय्या करना विना शस्त्र का वध माना जाता है।
विनम्रता
क्रोधी क्रोध के निमित्त को हटाना चाहता है, पर मानी मान के निमित्तों को रखना चाहता है। क्रोधी कहता है गोली से उड़ा दो, पर मानी कहता है मारो मत, दबा के रखो।
विनम्रता
प्रतिकूलता में क्रोध और अनुकूलता में मान आता है।
विनम्रता
कर्तृत्व बुद्धि, भोक्तृत्वबुद्धि और स्वामित्वबुद्धि- अज्ञानी अपने को पर पदार्थ का कर्ता मानता है। जैसे कुत्ता गाड़ी के नीचे चलता है तो मानता है कि 'मैं गाड़ी चला रहा हूँ', पर उसे नहीं मालूम कि गाड़ी चलाने वाला कोई दूसरा है यही कर्तृत्व बुद्धि कहलाती है। इसी प्रकार पर पदार्थ का अपने को भोक्ता मानता है, मकान, दुकान आदि का अपने को स्वामी मानता है, जैसा की छः ढाला में कहा है 'मैं सुखी-दुःखी मैं रङ्क राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव' इत्यादि।
विनम्रता
जिनका शारीरिक स्वास्थ्य कमजोर होता है, उन्हे ठण्डी हवा से जुकाम और गरम हवा से लू लग जाती है। उसी प्रकार निन्दा की गर्म हवा से क्रोध की लू व प्रशंसा की ठण्डी हवा से मान का जुकाम हो जाता है।
विनम्रता
अकड़ मुर्दे की खास पहचान है, जो जितना अकड़ता है, यमराज उसे उतने ही जल्दी पकड़ता है।
विनम्रता
कभी मूँछ का तो कभी पूँछ का झगड़ा बना ही रहता है, अर्थात् कभी कहता है कि मेरी इज्जत का सवाल है, कभी कहता है मुझे पूँछा ही नहीं।
विनम्रता
फुटबाल में जब तक हवा रहती तब तक लोग लात मारते हैं, और जब हवा निकल जाती है तो हाथ में उठा लेते हैं, अतः अकड़ ही संसार भ्रमण का कारण है।
विनम्रता
मान मानी को लोगो की दृष्टि में अप्रिय बनाता है और अन्दर से मानी को अयोग्य बनाता है।
विनम्रता
मान मानव की मानवता नष्ट करके दानव बना देता है।
विनम्रता
दूसरों को नीचा दिखाना और अपने को ऊँचा दिखाना मानी का काम है।
विनम्रता
अभिमानी के निरपराधी होने पर भी अनेक बैरी होते हैं, निन्दा होती है, सब उसका पतन चाहते हैंतथा हृदय में कोमलता न आने का कारण अहङ्कार है।
विनम्रता
जिससे स्वार्थ सधता है उसको भगवान मानते हैं, जिससे स्वार्थ नहीं सधता है तो भाई भी शत्रु लगता है।
विनम्रता
पुण्योदय का अहङ्कार करने वाले अन्त में बड़े-बड़े कष्ट पाते हैं।
विनम्रता
अभिमान और दीनता दोनों में अकड़ है, मानी पीछे को और दीन आगे को झुकता है, सीधे दोनों नहीं होते हैं।
विनम्रता
मानी ऐसा चलता है जैसे वह चौड़ा हो और बाजार सकरा हो और दीन ऐसे चलता है जैसे भारी बोझ से दबा जा रहा हो।
विनम्रता
क्रोध कड़वा व मान मीठा जहर है दोनों प्राण नाशक है।
विनम्रता
मान संसार का बढ़ाने वाला और मार्दव संसार का घटाने वाला है, अभिमानी निर्दयी और विनम्र दयालु होता है, अभिमानी का व्रत तप स्वाध्याय सब निष्फल है।
विनम्रता
दूसरों की प्रशंसा व उन्नति न देख पाना ईर्ष्या व असहिष्णुता का द्योतक है।
विनम्रता
बाहुबली का जरा सा मान केवलज्ञान होने में बाधक बना रहा।
विनम्रता