Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 115

निःकांक्षित अङ्ग।

9 सूत्र

इस लोक में वैभव आदि, परलोक में चक्रवर्ती का वैभव एवं एकान्तवाद से दूषित परमत की इच्छा नहीं करना निःकाङ्क्षित अङ्ग है।
अनासक्ति
पराधीन, बाधासहित, जिसकी परम्परा टूट जाती है एवं बन्ध का कारण हीनाधिक प्राप्त होने वाला इन्द्रिय विषय जन्य सुख ‘दुःख’ ही है ऐसी श्रद्धा होना निःकाङ्क्षित अङ्ग है।
अनासक्ति
इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाला सुख पराधीन, बाधा सहित, अनियमित, बन्ध का कारण व हीनाधिक एवं दुःख रूप ही है।
अनासक्ति
व्रतादि क्रियाओं को करते हुए उनसे भोगों की इच्छा करना, कर्म और उसके फल में आत्मीय भाव रखना, अन्यदृष्टि प्रशंसा करना और काङ्क्षा रूप भाव मिथ्यात्व का चिन्ह है।
विवेक
भोग अभिलाषा से पर भव में इष्ट पदार्थों का संयोग होना तो दूर, किन्तु इसलोक सम्बन्धी स्वार्थ की सिद्धि भी नहीं होती है।
अनासक्ति
जैसे उन्मत्त के मन में नाना प्रकार के विकल्प उठते हैं, वायु से समुद्र में तरङ्गें उठती हैं, वैसे ही मिथ्यात्व के उदय में नाना विकल्प उठते हैं।
विवेक
अन्तरित- भूतकाल में हुए राम-रावण आदि या भविष्य में होने वाले तीर्थंङ्कर आदि अन्तरित पदार्थ कहलाते हैं, एवं दूरवर्ती- द्वीप समुद्र स्वर्ग-नरक आदि दूरवर्ती पदार्थ कहलाते हैं। ये आस्तिक्य गुण के विषय हैं।
विवेक
इह लोक भय, पर लोक भय, मरण भय, वेदना भय, अगुप्ति भय, अनरक्षा भय, अकस्मात् भय सम्यग्दृष्टि इन सात भयों से रहित होता है।
विवेक
अञ्जनचोर के समान निःशङ्क होना चाहिए।
विवेक