Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 114

तीन प्रकार के पदार्थ।

8 सूत्र

भगवान् ने समस्त वस्तुओं को अनेकान्तात्मक कहा है सो यह सत्य है कि असत्य है ऐसी शङ्का नहीं करना निःशङ्कित अङ्ग कहलाता है।
विवेक
तत्त्व यही है, ऐसा ही है, अन्य नहीं है, अन्य प्रकार से भी नहीं है इस प्रकार तलवार पर चढ़ाये हुए पानी के समान दृढ़ श्रद्धान होना निःशङ्कित अङ्ग है।
विवेक
घर में सर्प की शङ्का होने पर नींद खत्म हो जाती है, उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कथित पदार्थ में शंका होने से सम्यग्दर्शन में दोष लग जाता है।
विवेक
धन, यौवन, परिवार पर शङ्का करना चाहिए देव-शास्त्र-गुरु पर नहीं।
विवेक
चार बदमाश एक-एक मील की दूरी पर खड़े हो गये और दक्षिणा में प्राप्त हुए बछड़े को चारों ने क्रम से कुत्ता कह दिया, पण्डित जी ने बछड़े को छोड़ दिया, उसी प्रकार दृढ़ श्रद्धा व पहचान न होने से धोखा होता है।
विवेक
तीन प्रकार के पदार्थ- सूक्ष्म परमाणु, कालाणु, धर्मादि द्रव्य ये इन्द्रियों से नहीं जाने जाते अतः सूक्ष्म हैं।
ज्ञान
देव का निन्दक दरिद्र, गुरु का निन्दक पापी, स्वामी का निन्दक कुष्ठी व गोत्र का निन्दक कुल का क्षय करने वाला होता है, साधु का निन्दक अपने आप को दूषित करता है, क्योंकि जो सूर्य पर भस्म फेंकता है वह भस्म उसी के सिर पर पड़ती है।
विवेक
बुझते हैं वे दीप जो तैल से जला करते हैं। हम तो हैं वे दीप जो आस्था से जला करते हैं।।
भक्ति