Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 107

किसके प्रति बहुमान।

8 सूत्र

संसारी प्राणी देखा-देखी करते हैं, परमार्थ का विचार नहीं करते, नारद जी ने कमण्डल को गुमने के भय से गङ्गा के किनारे रेत से ढक दिया, लोगों ने समझा इससे पुण्य होता होगा इसलिए सबने रेत के ढेर लगा दिए, नारद जी स्नान करके जब बाहर आये तो वहाँ पर रेत के अनेक ढेर बन गये नारद जी ने अपना कमण्डल बहुत खोजा किन्तु कमण्डल ही गुम गया यह लोकमूढ़ता है।
विवेक
तीन मूढ़ता, आठ मद, छह अनायतन, आठ शङ्कादि दोष ये सम्यग्दर्शन के पच्चीस दोष हैं।
विवेक
आठ मद, तीन मूढ़ता, छः अनायतन, आठ शङ्कादि दोष, सात व्यसन, सात भय, पाँच अतिचार, इन चवालीस दोषों से रहित सम्यग्दृष्टि होता है।
विवेक
सात भय, सात व्यसन, पच्चीस दोष से रहित, संसार शरीर भोगों से विरक्त, आठ अङ्ग सहित सम्यग्दृष्टिपञ्च परमेष्ठी का भक्त होता है।
विवेक
जो उग्र, तीव्र स्वभाव, दुष्ट, दुर्भाव, कुशास्त्र श्रवण करने वाला, दुष्टभाषी, मिथ्यामद से युक्त है वह मिथ्यादृष्टि है।
विवेक
जो क्षुद्र (नीच प्रकृति), रौद्र, रुष्ट, दूसरों का बुरा चाहने वाले, चुगलखोर, घमण्डी, ईर्ष्यालु, गायक, याचक, भण्ड वचन बोलने वाला, एवं जिसका दुष्ट स्वभाव है वह मिथ्यादृष्टि है।
विवेक
आत्मा के प्रति या शरीर के प्रति? लौकिक धन श्रेष्ठ है या ज्ञानधन? इन्द्रिय सुख का बहुमान या अतीन्द्रिय सुख का? इष्ट क्या है इन्द्रिय सुख या सम्यग्दर्शनादि? अनिष्ट क्या है? दुःख, आकुलता, मिथ्यादर्शन, मिथ्यादृष्टि इन्द्रिय सुख के लिये बीस हजार का वी.सी.आर., फ्रिज आदि खरीदता है लेकिन धर्म के लिए पुस्तक मन्दिर से लेकर पढ़ता है।
विवेक
मिथ्यादृष्टि मोक्ष के साधन भूत आत्मा का एक क्षण को भी चिन्तन नहीं करता, रात-दिन दूसरों के विषय में सोचता है।
विवेक