Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 103

लोक मूढता।

8 सूत्र

शुद्ध सम्यग्दृष्टि जीव अविरति होने पर भी नरक, तिर्यञ्च, नपुंसक, स्त्री पर्याय, नीचकुल, विकृत अङ्ग, अल्पायु और दरिद्रता को प्राप्त नहीं होता है।
विवेक
सबसे बड़ा अन्धकार मिथ्यात्व है, जिसको करोड़ सूर्य भी नहीं हटा सकते हैं, यही सबसे बड़ी आग है जिसको मेघ भी नहीं बुझा सकते हैं, यही सबसे बड़ा जहर है जो प्राणियों को जन्म-जन्मान्तरों में विषाक्त बना कर रखता है।
विवेक
लोकमूढ़ता- आश्विन मास में लोग नदी में खड़े होकर पूर्वजों को पानी दे रहे थे, पण्डित बनारसीदास जी अपने घर की ओर मुँह करके पानी देने लगे, किसी ने पूछा क्या कर रहे हो? पण्डितजी ने कहा घर में गाय प्यासी बँधी है उसको पानी पिला रहे हैं, लोगों ने कहा यहाँ से गाय की प्यास कैसे बुझ जायगी? पण्डितजी ने कहा! जब आपके मृतक पूर्वज तृप्त हो सकते हैं तो मेरी गाय की प्यास क्यों नहीं बुझ सकती है, तब लोगों को अपनी अज्ञानता का अहसास हुआ।
विवेक
राम को राज्य नहीं मिला तो हर्ष-विषाद नहीं किया, उस समय ज्ञानी थे, जब सीता का हरण हुआ और लक्ष्मण को शक्ति लगी, तो रो रहे थे, तब वे अज्ञानी थे।
अनासक्ति
कषाय और इन्द्रियासक्ति इस संसार की जड़ है और इस जड़ की भी जड़ है मिथ्यादर्शन।
अनासक्ति
सम्यक्त्वी की पहचान- अपने में सम्यक्त्वी से होने वाले गुण प्रशमादि से उत्पन्न वचन व्यवहार और काय व्यवहार के अनुमान से जाने जाते हैं।
विवेक
एक शची इन्द्राणि अपने जीवन में असंख्य तीर्थंङ्करों के कल्याणक मनाती है, पहली बार के प्रथम दर्शन से ही शची इन्द्राणि को सम्यग्दर्शन हो जाता है।
भक्ति
तन, मन, धन पर दृष्टि रखने वाले मिथ्यादृष्टि है एवं पूजन, मनन, अध्ययन पर दृष्टि रखने वाले सम्यग्दृष्टि है।
विवेक