Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 82

यश हो, परवश न हो

19 सूत्र

यदि भीख माँगनी ही है तो बड़ों से आशीर्वाद, छोटों से सहयोग, संसार से प्यार, परमात्मा से दुआ माँगो।
विनम्रता
श्रावक से माँगने वाला ही भिखारी नहीं परमात्मा के चरणों में प्रार्थना कर याचना करने वाला सर्वोच्च भिखारी है।
भक्ति
आपके दु:खों का कारण संसार में रहकर सुख की माँग है।
संतोष
दुनिया का सबसे बढ़िया जेवर आपकी अपनी मेहनत है।
पुरुषार्थ
याचना करने वाला कौन व्यक्ति लघु नहीं गिना जाता? अर्थात् सभी।
संतोष
जैसे ही हम माँगते हैं हमारा हृदय सिकुड़ जाता है और चेतना के द्वार तत्काल बंद हो जाते हैं।
संतोष
गरीबी कुछ ही चीजें माँगती है, विलासता बहुत-सी किन्तु मोह समस्त चीजें चाहता है।
संतोष
कामना का सर्वदा त्याग कर दें, तो आवश्यक वस्तुएँ स्वत: प्राप्त होंगी क्योंकि वस्तुएँ निष्काम पुरुषों के पास आने के लिए लालायित रहती हैं।
संतोष
जो मुनि तप चारित्र सद्गुणों के द्वारा मेरु के समान गुरुत्व को प्राप्त हुआ है वह भी याचना के द्वारा आक की रूई के समान लघु हो जाता है।
संतोष
अपने माता-पिता के पैर छूने में जिन्हें शर्म आती है, यश: कीर्ति भी उनके पास आने में शर्माती है।
परिवार
मरने के बाद तुम्हें भुला न दिया जाय इसके लिए दो में से एक काम जरूर करो या तो पढ़ने लायक कुछ लिख जाओ या लिखने लायक कुछ कर डालो।
समृद्धि
प्राप्त करना है तो रागी विरागी दोनों गावे ऐसा यश प्राप्त करो।
समृद्धि
यश:कीर्ति पुण्य प्रकृति है जो पुण्य पुरुषों की स्तुति वंदना के बिना प्राप्त नहीं होती है।
समृद्धि
यश:कीर्ति पुण्य का फल है, गुणों का आंकलन नहीं।
समृद्धि
देह छूटने के बाद राख हो जाने पर प्राणी अपने यश से वैसे ही जाना जाता है, जैसे कपूर अपनी सुगंध से।
समृद्धि
बड़े आदमियों का नाम फैलने से जितने फायदे हैं, उतनी ही मुश्किलें भी हैं।
समृद्धि
जो आदमी अपनी प्रशंसा के भूखे होते हैं वे साबित करते हैं कि उनमें योग्यता नहीं है। जिसमें योग्यता है उसका ध्यान ही प्रशंसा की ओर नहीं जाता है।
विनम्रता
बाह्य प्रसिद्धि के प्रसंगों से दूर भागने वाला ही ब्रह्म ज्ञानी होता है।
अनासक्ति
प्रशंसा का विष संन्यास को बदनाम कर देता है। प्रशंसा का अमृत संन्यास को मृत बना देता है।
अनासक्ति