Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 3 / 11

विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और धैर्य; ये पाँच मनुष्य के स्वाभाविक मित्र बताए गए हैं। विद्वान् पुरुष इनके द्वारा ही जगत् के कार्य करते हैं।
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अधिक निरीक्षण करना, अधिक अनुभव करना एवं अधिक अध्ययन करना ये तीन शिक्षा प्राप्त करने के आधार स्तंभ हैं।
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जो मनुष्य दूसरे के मुख से निकलने के पहले ही उसके मन की बात को जान लेता है, वह जगत् का अलंकार स्वरूप है।
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श्रोताओं के सामने आने पर भयभीत होने वाले व्यक्ति का ज्ञान उसी प्रकार है, जैसे युद्ध क्षेत्र में नपुंसक के हाथ में तलवार।
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जो लोग ज्ञानी हैं, लेकिन विज्ञजनों के सामने आने से डरते हैं, वे अज्ञानियों से भी गये बीते हैं।
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गुरुओं की कठोर अक्षरों वाली वाणी से तिरस्कृत मनुष्य महत्त्व प्राप्त करते हैं, कसौटी पर घिसे बिना मणि राजाओं के सिर पर स्थान नहीं पाती है।
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उपदेश की अपेक्षा उदाहरण सदैव अधिक प्रभावोत्पादक होता है।
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जिस राष्ट्र में विद्वान् सताये जाते हैं, वह राष्ट्र विपत्तिग्रस्त होकर वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे टूटी नौका जल में डूब कर नष्ट हो जाती है।
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लोकोक्तियों को विद्वत्ता का सूत्र कहा जा सकता है।
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अनुभवहीन व्यक्ति के लिए सूक्ति ग्रन्थ का अध्ययन अच्छी बात है।
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अपनी बुद्धि से साधु होना अच्छा है परन्तु पराई बुद्धि से राजा होना अच्छा नहीं है।
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प्रतिभा अविष्कार करती है, बुद्धि केवल अन्वेषण करती है।
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बुद्धिमान व्यक्ति अपने शत्रुओं से बहुत बातें सीखते हैं।
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मूर्खों की सफलताओं की अपेक्षा बुद्धिमानों की गलतियाँ अधिक मार्ग दर्शक होती हैं।
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विद्वान् शत्रु भी हो तो भी श्रेष्ठ होता है, मूर्ख हितकारी भी हो तो भी श्रेष्ठ नहीं होता है।
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अनुचित बातों का आग्रह करने वाला प्रायः मूर्ख होता है विद्वान् नहीं।
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मूर्ख के चिह्न–अहंकारी, हठी, अप्रियवादी।
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ज्ञानियों का मूल मंत्र है कि जहाँ जो कुछ अच्छा मिले सीखना चाहिए।
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मानव का विद्यालय 'उदाहरण' है और वे अन्यत्र कुछ नहीं सीखते हैं।
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किसी लेखक का उच्चतम सम्मान उसे उद्धृत करना है।
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उद्धरणों के द्वारा बुद्धिमानों की बुद्धिमत्ता तथा युग-युग के अनुभवों को संजोया जा सकता है।
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यदि गुरु अयोग्य शिष्य चुनें तो उसकी बुद्धि हीनता ही प्रकट होती है।
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प्रत्यक्ष घटना विचार से कई अधिक प्रभावशालिनी होती है।
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जो व्यक्ति जितना अशिक्षित है, वह उतना गरीब है।
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बुद्धिमान दूसरों की हानि से शिक्षा ग्रहण करते हैं जबकि मूर्ख अपनी हानि से भी कुछ नहीं सीख पाते हैं।
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शिक्षा, उपदेश, सत्संग किसी से भी हमारे ऊपर उतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना अपनी भूलों के कुपरिणाम को देखकर पड़ता है।
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एक व्यवहार बुद्धि सौ अव्यवहार बुद्धियों से अच्छी है।
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विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला है।
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ज्ञानी पुरुष विवेक से सीखते हैं, साधारण मनुष्य अनुभव से, अज्ञानी आवश्यकता से और पशु स्वभाव से शिक्षित होता है।
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दूसरों के दुर्भाग्य से सावधानी सीखना ही अधिक उचित है।
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जो व्यक्ति ज्ञानी मनुष्यों के समुदाय में अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रह सकता है, वही विद्वानों में विद्वान् माना जाता है।
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जीवन सभी जीते हैं किन्तु जीने के दौरान होने वाले अनुभवों का इत्र बहुत अल्प लोग ही निकाल पाते हैं।
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मनुष्य का जीवन अनुभवों का शास्त्र है जिसका प्रत्येक अध्याय मार्गदर्शक है। अनुभव अमूल्य कसौटी है।
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कष्ट सहने पर ही अनुभव होता है।
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आचारहीन ज्ञान नष्ट हो जाता है और ज्ञानहीन आचार जैसे वन में अग्नि लगने पर पंगु उसे देखता हुआ और अंधा दौड़ता हुआ भी आग से बच नहीं पाता, जलकर नष्ट हो जाता है।
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एक बुद्धिमान आदमी अपने दुश्मन का भी बेहतर उपयोग कर सकता है, जबकि मूर्ख अपने मित्र तक का भी उपयोग नहीं कर पाता है।
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कला वही है जो नयनाभिराम और कर्णतृप्ति ही न दे बल्कि आत्मा को भी ऊपर उठाये।
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भूल करके आदमी सीखता तो है, पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल करता जाए और कहे कि हम सीख रहे हैं।
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इतिहास केवल देखना नहीं, चिन्तन भी है और चिन्तन सदैव रचनात्मक होता है।
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भूल कुछ नया सीखने का अवसर होती है, बशर्ते हम उस अवसर का अर्थ और महत्त्व समझें।
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विचारवान व्यक्तियों का मुट्ठी भर समूह ही सारी दुनिया को उलट-पुलट कर सकता है।
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सवाल करना मानव की तरक्की को जाहिर करता है।
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यदि आप समझदार हैं तो अपनी गलतियों को मत दुहराइये।
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प्रतिभा स्वतंत्रता के वातावरण में ही मुक्त सांस ले सकती है।
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भगवती प्रज्ञा के प्रसाद से आत्म विजय प्राप्त करना है।
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पढ़े लिखे लोग परिस्थितियों के हिसाब से खुद को बदल लेते हैं, अनुभवी लोग अपने हिसाब से परिस्थितियों को बदल लेते हैं।
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बुद्धिमान व्यक्ति कभी अपनी हानि पर शोक नहीं करते बल्कि प्रसन्नतापूर्वक क्षति को पूरा करने का उपाय करते हैं।
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जो मन अज्ञान के कारण रात्रि है वही मन ज्ञान के प्रकाश से दिवस बन जाता है।
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कुशल व्यक्ति के तप होता है, निपुण व्यक्ति के संयम होता है, समता भावी के वैराग्य होता है और श्रुत के अभ्यास से ये तीनों होते हैं।
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जैसे नेत्र विहीन व्यक्ति किसी भी गड्ढे में गिर सकता है वैसे ही ज्ञान विहीन साधक कभी भी असंयम के गड्ढे में गिर सकता है।
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अनुभव और दण्ड ऐसी सीख देते हैं जो अन्य उपायों से सम्प्रेषित नहीं होती है।
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बुद्धिमान आपत्ति और कष्ट में भी उत्साह नहीं छोड़ते हैं।
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कर्म वही है जो बंध कारक न हो। विद्या वही है जो मुक्ति कारक हो। इसके अतिरिक्त अन्य कर्म प्रयास मात्र है और अन्य विद्या शिल्प निपुणता मात्र है।
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बहुश्रुत होना, शिल्प सीखना, विनयी होना, सुशिक्षित होना और सुभाषित वाणी बोलना, यह उत्तम मंगल है।
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जिसे हम नहीं समझ सकते वह गलत ही है, यह मानने की जल्दबाजी करना भूल है, कितनी ही बातें पहले समझ में नहीं आती थीं, वे आज दीपक की तरह दिखाई देती हैं।
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इस अज्ञानी लोक को जिस आचरण से तत्त्वबोध हो वह आचरण ज्ञानी करता है क्योंकि ज्ञानी का अज्ञानी को बोध देने के अतिरिक्त और कुछ कर्त्तव्य नहीं है।
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मनुष्य के पास बुद्धि बल से बढ़कर श्रेष्ठ कोई दूसरी वस्तु नहीं है।
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जिसके पास बुद्धि है उसके पास सबकुछ है किन्तु मूर्ख के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है।
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बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
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थोड़ा पढ़ना और अधिक सोचना, कम बोलना अधिक सुनना, यही बुद्धिमान बनने का उपाय है।
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बुद्धिमान के पास थोड़ा सा भी धन हो तो वह बढ़ता रहता है और वह दक्षतापूर्वक काम करते हुए संयम के द्वारा सर्वत्र प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है।
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बुद्धिमान मूर्खों से जितनी शिक्षा प्राप्त करते हैं, उतनी सीख मूर्ख बुद्धिमानों से नहीं ले पाते हैं। बुद्धिमान लोग सदैव पुरुषार्थ द्वारा अपने भाग्य को बदल देते हैं।
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जैसे मनुष्य कुदाल से पृथ्वी को खोदकर उसके तल से जल प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार गुरु की सेवा से शिष्य गुरु के पास विद्यमान विद्या को प्राप्त कर लेता है।
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शिक्षा का फल दीक्षा है। विद्या का फल विनय है। स्वाध्याय का फल सन्त सेवा है।
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उपदेश देना सरल है लेकिन उपाय बताना कठिन है।
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प्रतिभाशाली तथा पावन हृदय वाले व्यक्ति जिन विचारों को संसार में फैलाते हैं, उनसे संसार में परिवर्तन आता है।
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कोई भी अक्षर अमंत्र नहीं है। कोई भी वृक्ष मूल अनौषध नहीं है। कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं है। केवल उनके जानने वाले मनुष्य दुर्लभ होते हैं।
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यह एक बात है कि किसी व्यक्ति को यह दिखाया जाये कि वह गलती पर है और यह दूसरी बात है कि उसे सत्य प्राप्त करा दिया जाये।
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शिक्षा एक ऐसी चीज है जिसकी जड़ें तो कड़वी होती हैं, परन्तु फल हमेशा बहुत ही मीठे होते हैं।
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अच्छी बात चाहे किसी धर्म, किसी आदमी की ही क्यों न हो उसे अवश्य ही ग्रहण करो।
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शास्त्रों (पुस्तकों) से ज्ञान मिल सकता है संस्कार नहीं।
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संस्कारित शिक्षा ही संस्कृति की रक्षा कर सकती है।
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हम प्रायः दूसरों के गुणों की अपेक्षा उनकी गलतियों से अधिक सीख लेते हैं।
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संसार में जितने प्रकार की प्राप्तियाँ हैं, उनमें शिक्षा सबसे बढ़कर है।
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कर्त्तव्य-ज्ञान से शून्य पुरुष के लिए शिक्षा देना अन्धे के सामने नाँचने के समान है।
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