Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 4 / 11

ज्ञानी मनुष्य की दृष्टि दूसरों की अच्छाईयों पर पड़ती है; जबकि मूर्ख लोग दूसरों के अवगुण देखते हैं।
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विद्याविहीन का उच्च कुल में जन्म लेना व्यर्थ है और विद्वान् चाहे नीचकुल में जन्म ले तो भी सम्माननीय है।
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बिना अनुभव के कोरा शाब्दिक ज्ञान अंधा है।
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अज्ञानी का झुकाव सत्य व तथ्य पर नहीं अपितु आश्चर्य पर होता है।
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यद्यपि तुम्हें गुरु या शिक्षक के सामने उतना ही अपमानित होना और नीचा बनना पड़े जितना कि भिक्षुक को धनवान् के समक्ष बनना पड़ता है, फिर भी तुम विद्या सीखो, मनुष्यों में अधम वे ही लोग हैं जो विद्या सीखने से विमुख होते हैं।
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इस लोक में अन्धे वे ही मनुष्य हैं जिन्होंने गुरु के समीप सभी तत्वों को प्रकाशित करने वाला कल्याणदायक नेत्र प्राप्त नहीं किया है।
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विश्व एक विशाल ग्रन्थ है और जो कभी घर के बाहर नहीं जाते वे केवल उसका एक ही पृष्ठ पढ़ पाते हैं।
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ज्ञान राशि के संचित कोश का नाम ही साहित्य है।
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अपूर्व वस्तु के निर्माण में समर्थ प्रज्ञा को प्रतिभा कहते हैं।
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प्रतिभा तो स्वतंत्रता के वातावरण में ही मुक्त साँस ले सकती है।
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शास्त्र को जानने वाला भी जो पुरुष लोक व्यवहार में पटु नहीं होता है, वह मूर्ख के समान है।
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अनेक विद्याओं का अध्ययन करके भी जो समाज के साथ मिलकर आचरण युक्त जीवन व्यतीत करना नहीं जानते हैं, वे अज्ञानी ही समझे जायेंगे।
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छोटी अवस्था में यात्रा शिक्षा का एक अंग है, बड़ी अवस्था में यात्रा अनुभव प्राप्त करने का विषय हैं।
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विद्वान् अज्ञानी पुरुषों से निन्दा या स्तुति पाकर भी स्वयं न तो निंदा करता है, न ही स्तुति अपितु उनको जैसे ज्ञान प्राप्त हो वैसा ही आचरण करता है।
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जो अपूर्ण है वह आवाज करता है और जो पूर्ण है वह शांत रहता है मूर्ख अधभरे जल घट के समान है और पंडित लबालब भरे तालाब के समान है।
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किसी के कहे बिना हृदय की बात को समझ लेने वाले से दूसरे व्यक्ति सम्पत्ति में समान होने पर भी, बुद्धि के कारण भिन्न होते हैं।
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बुरी पुस्तकें पढ़ना जहर पीने के समान है।
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श्रवण शक्ति होने पर भी वे कान बहरें हैं, जिनको उपदेश सुनने का अभ्यास नहीं है।
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ग्रन्थ ऐसे अध्यापक हैं जो बिना बेंत मारे, बिना कटु शब्द बोले, बिना क्रोध किए, बिना वस्त्र व धन के हमें शिक्षा प्रदान करते हैं।
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दान से भोग प्राप्त होते हैं, तप से परम इन्द्रत्व तथा ज्ञान से जन्म-जरा-मरण से रहित मोक्ष पद प्राप्त होता है।
ज्ञान
बोध का आगमन ही वासना का विसर्जन बन जाता है।
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अज्ञान और अभिमान का मतलब इधर कुँआ तो उधर खाई।
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पुस्तक का मूल्य रत्नों से भी अधिक है क्योंकि रत्न बाहरी चमक दिखाते हैं जबकि पुस्तकें अन्तःकरण को उज्ज्वल बनाती हैं।
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पुस्तक प्रेमी सबसे अधिक धनी और सुखी हैं।
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जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा वह जन्मान्ध है क्योंकि वह जैसे श्वजन (कुक्कुर समूह) स्वजन (आत्मीजन), सकृत (एकबार), शकृत (विष्टा), सकल (सम्पूर्ण) शकल (खण्ड) आदि को नहीं समझ पाएगा। जो न्यायशास्त्र से रहित है वह गूंगा है, जो साहित्य से रहित है वह लंगड़ा है और जो कोष रहित है वह निर्धन है।
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थोड़ा पढ़ना, अधिक सोचना, कम बोलना, अधिक सुनना-यह बुद्धिमान बनने के उपाय है।
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विद्यारूपी धन को चोर चुरा नहीं सकता, राजा दण्ड के रूप में वसूल नहीं कर सकता, भाई हिस्से में बाँट नहीं सकता, विद्या का कोई बोझ नहीं होता, दान करने से वह बढ़ती है, विद्या सब धनों में श्रेष्ठ है।
ज्ञान
सत्य, ज्ञान, तप, अहिंसा, विद्वान् के प्रति नम्रभाव और सुशीलता को जो धारण करता है वह विद्वान् है न कि जो पढ़ता-पढ़ाता है, वह विद्वान् है।
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विवेक और बुद्धि विद्या की सन्तान है।
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व्यक्ति की कीमत शक्ल से नहीं उसकी अक्ल से होती है।
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ज्ञानी शस्त्र का नहीं शास्त्र का प्रयोग करता है।
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जो शास्त्र का अर्थ अपनी स्वार्थ बुद्धि से निकालता है, वह शास्त्र को शस्त्र बना लेता है।
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सच्चा शास्त्र (ग्रन्थ) वह है जो आत्मा की ग्रन्थियों को खोलकर निर्ग्रन्थ पद प्राप्त कराता है।
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शिक्षा एक दूध देने वाली गाय के समान है जो हमेशा मनुष्य को ज्ञान देती रहती है।
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शिक्षा एक गुप्त धन के समान है इसलिए शिक्षा को अवश्य प्राप्त करो।
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जिस आदमी को पढ़ने का शौक होता है वह मूर्ख नहीं रहता है।
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स्वाध्याय से ज्ञान की वृद्धि होती है, ज्ञानवृद्धि होने से वैराग्य बढ़ता है, वैराग्य बढ़ने से संसार का त्याग होता है और संसार त्याग से जीव मोक्ष (सिद्धि) प्राप्त करता है।
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काम से अधिक बुरा कोई रोग नहीं है और ज्ञान के समान कोई विश्वसनीय मित्र नहीं है।
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धन की रक्षा तुम्हें करना पड़ती है, मगर ज्ञान तुम्हारी रक्षा करता है।
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जीवन के कुरुक्षेत्र को जीतने के लिए पुस्तकों से बेहतर कोई अस्त्र नहीं है।
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अज्ञान के अतिरिक्त आत्मा के और किसी रोग का मुझे पता नहीं है।
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अनुकरण से मुक्ति नहीं मिलती, मुक्ति मिलती है ज्ञान से।
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विचार का चिराग बुझ जाने से आचार अंधा हो जाता है।
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अज्ञान विष वृक्ष है अज्ञानी पर ही विपत्ती आती है और वही दुःख पाता है।
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अज्ञान की सन्तान मोह और मोह की सन्तान दुःख है।
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अज्ञानी मनुष्य का तो जीवन ही व्यर्थ है।
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विद्या के सामने दूसरी तरह की दौलत कुछ भी नहीं है।
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जिसके पास विद्या रूपी नेत्र नहीं है वह अंधे के समान हैं।
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मानव का सच्चा जीवन साथी विद्या है, जिसके कारण वह विद्वान् कहलाता है।
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ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञान का अभिमान नरकों में ले जाता है।
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विद्या और धन का महत्त्व सदुपयोग करने में है, संचय करने में उतना नहीं।
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काव्य का ध्येय मनोरंजन न होकर संवर्धन और राष्ट्र निर्माण होना चाहिए।
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काव्य वही है जो मानव हृदय को काबू में कर ले।
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वही काव्य और वही साहित्य चिरंजीवी रहेगा, जिसे लोग सुगमता से पा सकेंगे, जिसे लोग आसानी से पचा सकेंगे।
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'पुस्तकें' ज्ञान-प्रसार के लिए अमूल्य और सुगम साधन हैं।
ज्ञान
जीवन की सार्थकता भोग में नहीं है, उसकी सार्थकता अनुभव के द्वारा ज्ञान हासिल करने में है।
ज्ञान
सुनने की इच्छा का अभाव, सेवा का अभाव, उतावलापन और आत्म-प्रशंसा; ये चार विद्या के शत्रु हैं।
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अतीत के महापुरुषों के जीवन से अपरिचित रहना जीवनभर निरंतर बाल्यावस्था में रहना है।
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अच्छी पुस्तकें सदैव अच्छे मित्र हैं।
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विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं।
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पुस्तकें मन के लिए साबुन का कार्य करती हैं।
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गंदी पुस्तकों का पढ़ना विष पीने के समान है।
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मैं नरक में भी अच्छी पुस्तकों का स्वागत करूँगा क्योंकि उनमें वह शक्ति है कि जहाँ होंगी वहीं स्वर्ग बन जाएगा।
ज्ञान
विकृत भोजन से जैसे शरीर रुग्ण हो जाता है, उसी तरह विकृत साहित्य से मस्तिष्क भी विकारग्रस्त होकर रुग्ण हो जाता है।
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वचन से बढ़कर लेख को प्रमाण माना जाता है क्योंकि लेख की प्रमाणिकता होती है, वचन तो भले ही बृहस्पति के द्वारा ही क्यों न कहे गये हो फिर भी प्रतिष्ठा नहीं होती है। ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।
ज्ञान
जिस प्रकार शरीर का खाद्य भोजनीय पदार्थ है, उसी प्रकार मस्तिष्क का खाद्य साहित्य है।
ज्ञान
पुस्तकें विश्वस्त दर्पण हैं, जो विद्वानों के मस्तिष्क का परावर्तन हमारे मस्तिष्क पर करती हैं।
ज्ञान
जो पुस्तकें हमें सबसे अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं वे हमारी सबसे बड़ी सहायक हैं।
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जिसे शास्त्र (पुस्तक) पढ़ने का शौक है वह सब जगह सुखी रह सकता है।
ज्ञान
शास्त्र (पुस्तक) समय के विशाल समुद्र में प्रकाश स्तंभ के समान हैं।
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आज के लिए और सदा के लिए पुस्तक सबसे बड़ी मित्र है।
ज्ञान
पुस्तक का एक सद्विचार आपको युगपत गुणों का, सुगंध का, ज्ञान का और आत्मा का अमरत्व प्रदान करता है।
ज्ञान
संसार में लाखों ईसा, मुहम्मद, बुद्ध, महावीर या राम जन्म लें तो भी तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकते, जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने के लिए कटिबद्ध नहीं होते, तब तक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता इसलिए दूसरों का भरोसा मत करो।
ज्ञान
जैसे अंधे प्राणी के लिए संसार अंधकारमय है और आँखों वाले के लिए प्रकाशमय वैसे ही अज्ञानी के लिए यह संसार दुःखों का समूह है और ज्ञानी के लिए आनंदमय है।
ज्ञान
जिसमें बुद्धि नहीं है, उसको बिना सींग का पशु समझना चाहिए।
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