Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 2 / 11

बुद्धिमत्ता का लक्ष्य स्वतंत्रता है, संस्कृति का लक्ष्य पूर्णता है, ज्ञान का लक्ष्य प्रेम है और शिक्षा का लक्ष्य चरित्र है।
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विद्या का अंतिम लक्ष्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए।
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अध्ययन करना, सुनना, चारित्र पालन करने वाले का ही पूर्ण सार्थक है, नट के समान दुरात्मा मनुष्य का बहुत अध्ययन करना अति लाभदायक नहीं है।
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बुद्धिमान अपने अनुभवों से सीखता है, अधिक बुद्धिमान दूसरों के अनुभवों से भी सीखता है।
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बुद्धिमान वह है जो जगत् को यथार्थ रूप से जाने, वर्तमान को ठीक से पढ़ सके, परिस्थिति के अनुसार चल सके और दूसरे का अभिप्राय समझ सके।
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वीरता के साथ जब बुद्धि नहीं रह जाती तो मानव भेड़िया बन जाता है।
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परम ज्ञान ग्रन्थ पढ़ने से नहीं परम चरित्र व ध्यान से उत्पन्न होता है।
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विपरीत ज्ञानी बन के रहने की अपेक्षा कम ज्ञानी रहना अच्छा है।
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धनी व्यक्ति को भूला जा सकता है पर ज्ञानी को नहीं।
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उच्च कुल में जन्म लेने वाले मूर्ख का उतना आदर नहीं होता जितना निम्न कुल से उत्पन्न विद्वान् का होता है।
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मनुष्य पशुओं से जितना उच्च है शिक्षित अशिक्षितों से भी उतना ही श्रेष्ठ है।
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यदि निर्धनता सभी अपराधों की माता है, तो बुद्धिहीनता अपराधों का पिता है।
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मोह रहित अल्पज्ञान मोक्ष का कारण है मोह सहित बहुत ज्ञान संसार का कारण है।
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मोह रहित अल्पज्ञान मोक्ष का कारण है मोह सहित बहुत ज्ञान संसार का कारण है।
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हम हर मिलने वाले से कुछ सीख सकते हैं पर हमारा दिमाग खुला होना चाहिए।
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यदि मनुष्य सीखना चाहे तो उसकी प्रत्येक भूल उसे कुछ न कुछ सिखा देती है।
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वह पुरुष धन्य है, जिसने गम्भीरता पूर्वक स्वाध्याय किया है और सत्य को पा लिया है, वह वैसे मार्ग पर चलेगा, जिससे उसे पुनः इस संसार में न आना पड़े।
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सच्ची शिक्षा—ममता छोड़ो मनन करो, बाधक नहीं साधक बनो, भोले नहीं पर सरल बनो, स्वच्छन्द नहीं पर स्वतन्त्र बनो, कुटिल नहीं पर चतुर बनो, मानी नहीं पर महान् बनो, कृतघ्नी नहीं कृतज्ञ बनो, क्रूर नहीं करुणा करो, शत्रुता नहीं मित्रता करो, हैवान नहीं इंसान बनो, भोगी नहीं योगी बनो, ईर्ष्यालु नहीं सच्चे इंसान बनो, कंस नहीं कृष्ण बनो, रावण नहीं राम बनो, मरीचि नहीं महावीर बनो।
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मैं उच्च शिक्षा उसी को कहूँगा जिसे पाकर मनुष्य विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्य तत्पर बन जाये।
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शास्त्र मील के पत्थर की भाँति हैं, जो मंजिल की तरफ इशारा करते हैं।
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शिक्षक में माता की ममता, पिता का प्यार, वैज्ञानिक सी सूझबूझ, तपस्वी सा मन और किसान जैसी सहजता-सरलता होनी चाहिए।
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शिक्षा का उद्देश्य मस्तिष्क को भरना नहीं, उसका पूर्ण विकास करना है।
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जिस शिक्षा में समाज और देश के कल्याण की चिंता के तत्त्व नहीं हैं, वह कभी सच्ची शिक्षा नहीं कही जा सकती है।
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शिक्षा राष्ट्र की सस्ती सुरक्षा है।
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शिक्षा का मतलब—व्यक्ति का समाजोपयोगी विकास करना है।
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जो मूर्ख और अहंकारी को शिक्षा दे, उसे स्वयं शिक्षा की जरूरत है।
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शिक्षक का आचरण ही बच्चों की असली किताब है।
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बच्चे को गधा कहकर शिक्षा देना, उसे लात मारने की कला सिखाना है।
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शिक्षा जीवन निर्वाह से अधिक जीवन निर्माण के लिए होनी चाहिए, उसका ध्येय जीविका मूलक नहीं जीवन मूलक होना चाहिए।
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तत्त्वज्ञान रहित जीवों के परिग्रह का परित्याग (मुनिपना) भी निष्फल होता है।
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गुरु आपत्ति काल के सिवाय शिष्य के विद्याध्ययन में विघ्न न डाले।
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यदि आप अपने ज्ञान को बहुमूल्य तथा उपयोगी बनाना चाहते हैं तो अपनी बुद्धि का द्वार प्रसन्नता से खोल दीजिए।
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ज्ञान को अपना गुरु बनाओ गरूर अर्थात् अहंकार का कारण नहीं बनाओ।
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ज्ञानी पद ग्रहण करते समय रोता है और अज्ञानी पद ग्रहण करते समय हँसता है।
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मूर्ख छोटा सा काम करते हैं और उसी में बेचैन हो जाते हैं, बुद्धिमान बड़े से बड़ा कार्य आरम्भ करते हैं और निश्चिंत बने रहते हैं।
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स्वाधीन कार्य है लेखन व स्वाध्याय।
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संसार में बुद्धि-बल बहुत बड़ा बल है, जिसमें बुद्धि नहीं उसमें बल नहीं होता है।
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बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
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बुद्धिमान व्यक्ति मूर्खों से जितनी शिक्षा लेता है, मूर्ख बुद्धिमानों से उतनी शिक्षा नहीं लेता है।
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संसार में मूर्ख मनुष्य को छोड़कर दूसरा कोई पशु नहीं है।
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मूर्ख की बुद्धि दूसरे के ज्ञान से ही प्रभावित रहती है।
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जो यह जानता है कि इस संसार में सुख है, वह महामूर्ख है।
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मूर्ख का हृदय उसके मुख में रहता है जबकि ज्ञानी की जिह्वा उसके हृदय में होती है।
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दूसरों में सुख खोजना ही सबसे बड़ी मूर्खता है।
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मूर्खों से बहस करके कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता है मूर्ख पर विजय पाने का एकमात्र उपाय यही है कि उसका अहसास न करें।
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मूर्ख लोग सुख में हँसते और दुःख में बिलखते हैं, ज्ञानी दोनों दशाओं में समभाव धारण करते हैं।
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सौ मूर्खों का गुरु बनने कि अपेक्षा एक ज्ञानी का शिष्य बनना श्रेष्ठ होता है।
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वे मूर्ख हैं जो शठता से धर्म उपार्जन, कपट से मित्र प्राप्ति, दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर स्थायी धन संग्रह, आलसी बने रहकर विद्या तथा क्रूर व्यवहार से जो स्त्री को वश में करना चाहते हैं।
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मूर्ख अपनी गलतियों से भी सबक नहीं लेते हैं, जबकि बुद्धिमान दूसरों की गलतियों से भी सीख ले लेते हैं।
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मूर्ख से पाला पड़ जाए तो बुद्धिमान मनुष्य को चुप रहना चाहिए।
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जो आगम को जानकर पाप, दुराचार और दुर्मार्ग का आचरण नहीं करते, वे विद्वान् हैं जो जानकर भी विषयासक्ति नहीं छोड़ते वे मूर्ख हैं।
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मूर्ख लोग जो कुछ पढ़ते हैं, उससे वे अपना अहित करते हैं और जो कुछ वे लिखते हैं, उससे दूसरों का अहित करते हैं।
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यदि निर्धनता सभी अपराधों की माता है तो बुद्धि हीनता (मूर्खता) सभी अपराधों का पिता है।
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विद्वानों का समय काव्य और शास्त्रों के अध्ययन में व्यतीत होता है और मूर्खों का व्यसनों में, निद्रा में तथा लड़ाई-झगड़े में बीतता है।
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विद्वत्ता, विद्या और विद्वान् की कद्र विद्वान् ही करते हैं, मूर्खों के बीच विद्वान् की दशा वैसी ही होती है जैसे अंधों के बीच किसी सुन्दरी की और नास्तिकों के बीच में धर्म ग्रन्थ की होती है।
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अनपढ़ व्यक्ति चाहे जितना बुद्धिमान हो, विज्ञजन उसकी सलाह को कोई महत्त्व नहीं देते हैं। अज्ञानी आदमी स्वयं अपने सिर पर जैसी आपत्तियाँ लाता है, वैसी आपत्ति शत्रु भी नहीं पहुँचा सकते हैं।
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जो मूढ़ अज्ञात विषयों के ज्ञान का दिखावा करता है वह ज्ञात विषयों के प्रति भी सन्देह उत्पन्न कर देता है।
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विपत्ति से बढ़कर अनुभव देने वाला विद्यालय आज तक नहीं खुला है।
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विनय से पढ़ा हुआ शास्त्र यदि प्रमाद से विस्मृत भी हो जाता है तो वह भवान्तर में नियम से प्राप्त होता है और केवलज्ञान प्राप्त करा देता है।
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अनुभव सिर्फ ज्ञान नहीं देता, अपितु अनुभव वासनाओं से भी मुक्ति दिला देता है।
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अनुभव मनुष्य का सबसे अच्छा अध्यापक होता है, पर मूर्ख लोग इससे कुछ नहीं सीख पाते हैं।
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हमारी जिंदगी इतनी लंबी नहीं है कि हम सिर्फ अपनी ही गलतियों से सीखें, अतः बुद्धिमानी इसी में है कि दूसरों की गलतियों से भी सीख लें।
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देशकाल परिस्थिति के अनुसार चिन्तन को नया स्वरूप देते रहना चाहिए न कि पुरानी प्रशंसाओं में डूबना चाहिए।
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अभिप्राय समझने वाला व्यक्ति ही बुद्धिमान होता है।
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बुद्धिमान मनुष्य अपने अनुभवों से सीखता है किन्तु और महान् दूसरों के अनुभवों से भी सीखता है।
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अच्छी बातों को ग्रहण कीजिए फिर चाहे वे किसी की भी क्यों न हो।
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जो सद्गुरु से प्राप्त हो जाता है, वह शास्त्रों से प्राप्त नहीं हो सकता।
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जिस प्रकार दवा चाहे वह कड़वी क्यों न हो रोग दूर कर देती है, उसी प्रकार सहृदयतापूर्ण सलाह चाहे वह कितनी ही कटु क्यों न हो, हमें सही रास्ता दिखाती है।
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जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा वह जन्मान्ध है, जो न्यायशास्त्र से रहित है वह गूँगा है, जो साहित्य से रहित है वह लँगड़ा है और जो कोष से रहित है, वह निर्धन है।
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जिसकी वाणी व्याकरण से शुद्ध नहीं है और जिसकी बुद्धि नयों से शुद्ध नहीं है वह पुरुष दूसरों के भरोसे क्लेश उठाते हुए अन्धे के समान है।
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जो व्यक्ति एक पाठशाला खोलता है वह एक जेल खाना बंद कर देता है।
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आदमी को बादाम खाने से नहीं, जीवन में ठोकर खाने से अक्ल आती है।
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उथला पानी, उथला ज्ञान, उथला संयम समय पाकर ये सभी जल्दी सूख जाते हैं।
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आहार, भय, मैथुन, परिग्रह ये संज्ञायें सम्यग्ज्ञान को नष्ट कर डालती हैं।
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सरस्वती की सिद्धि उसे ही होती है जो श्री और श्रीमती से दूर रहता है।
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