बदल जाओ वक्त के साथ या फिर वक्त को बदलना सीखो, मजबूरियों को मत कोसो हर हाल में चलना सीखो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जीवन में एक बार जो फैसला कर लिया तो फिर पीछे मुड़कर मत देखो क्योंकि पलट-पलट कर देखने वाले इतिहास नहीं बनाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
लक्ष्य पर आधे रास्ते तक जाकर कभी वापस न लौटें क्योंकि वापस लौटने पर भी आधा रास्ता पार करना पड़ता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्हें सपने देखना अच्छा लगता है उन्हें रात छोटी लगती है और जिन्हें सपने पूरे करना अच्छा लगता है उन्हें दिन छोटा लगता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
किसी मकसद के लिए खड़े हो तो पेड़ की तरह, गिरो तो बीज की तरह जिससे दुबारा उठकर उसी मकसद के लिए पुरुषार्थ कर सको। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्दगी जीना आसान नहीं होता, बिना संघर्ष कोई महान् नहीं होता, जब तक न पड़े हथौड़ी की चोट तब तक पत्थर भी भगवान् नहीं होता। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आप अपने जीवन में विशुद्धि और उत्साह शक्ति को भंग मत करना क्योंकि इसी से लौकिक और पारमार्थिक दोनों कार्यों में सफलता मिलती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
श्रम करने वालों के जीवन में उदासी और निराशा का कोई स्थान नहीं रहता है और वे ही समाज में स्वतंत्रता, समता, बन्धुता विकसित करते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
श्रम से ही कृषि से लेकर उद्योगों तक उन्नति हुई और समुद्र की गहराइयों से लेकर अन्तरिक्ष की ऊँचाईयों तक व्यक्ति पहुँचा है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अपनी शक्ति को छोटा न समझें, एक छोटी-सी चिंगारी भी विशाल वन को जलाकर राख कर सकती है। आत्मशक्ति भोग से नहीं योग से प्राप्त होती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
इंसान होकर हम हार क्यों मानें जब बहती नदी ने आज तक नहीं पूछा कि समुद्र कितनी दूर है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पराजय तब नहीं होती जब आप गिर जाते हैं, पराजय तब होती है जब आप उठने से इंकार कर देते हैं। जो झिझकता है वह हारता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
मनुष्य धन के द्वारा अधिक जीता है। विद्या से सुख पूर्वक जीता है। शिल्प से थोड़ा जीता है। बिना कर्म के मनुष्य जीवित ही नहीं रहता है पुरुषार्थ 0 – भेजें
राम ने सुग्रीव से पूछा कि लंका कितनी दूर है? सुग्रीव ने उत्तर दिया स्वामी! आलसियों के लिए बहुत दूर है, पर उद्यमशील के हाथ के पास ही है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आलस्य सुख रूप प्रतीत होता है परन्तु उसका अन्त दुःख है तथा कार्य दक्षता दुःख रूप प्रतीत होती है परन्तु उससे सुख का उदय होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ऐश्वर्य, लक्ष्मी, लज्जा, धृति और कीर्ति ये कार्य दक्ष पुरुष में ही निवास करते हैं, आलसी में नहीं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आलसी और अनुद्योगी के सौ वर्ष के जीवन से दृढ़ उद्योग करने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हमारा महान् गौरव कभी भी न गिरने में नहीं है, अपितु जब भी गिरें तो हर बार उठने में है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यह कहना कि 'जब सब करेंगे तब हम करेंगे', न करने का बहाना है, हमें ठीक लगता है यह इसलिए हम करें, जब दूसरों को ठीक लगेगा तब वे करेंगे। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सदा दक्ष, उद्योग परायण और स्वयं काम करने वाला बनें। अपने सभी कर्त्तव्यों के पालन करने में दूसरे को अवकाश नहीं देना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सुनने वाले लाखों है, सुनाने वाले हजारों हैं, समझने वाले सैकड़ों हैं परन्तु करने वाले कोई विरले ही हैं, सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है, जो करते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यदि तुम्हारा लक्ष्य महान् हो और तुम्हारा साधन सामान्य हो तो भी कार्य करो क्योंकि केवल कार्य के द्वारा ही तुम्हारे साधनों में वृद्धि हो सकती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
योग्य पुरुषों के लिए कोई भी कार्य अत्यन्त कठिन नहीं होता है, उद्योगी मनुष्यों के लिए कोई स्थान दूर नहीं होता है, विद्वानों के लिए कोई देश विदेश नहीं होता है, प्रिय वचन बोलने वाले के लिए कोई व्यक्ति पराया नहीं होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
त्रुटियाँ तो केवल उसी से नहीं होगी जो कभी कोई काम करे ही नहीं, सर्वोत्तम मनुष्य त्रुटियों से ढलकर ही निकलते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो ईश्वर की आराधना के साथ-साथ पुरुषार्थ करते हैं उनके दुःख और दारिद्रय दूर होते हैं और ऐश्वर्य बढ़ता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिनके भाग्य में विनाश लिखा है, उनकी टालमटोल, विस्मृति, सुस्ती और निद्रा-ये चार निकृष्ट नौकायें हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो लोग हल के सहारे जीते हैं, वास्तव में वे ही जीते हैं और सब लोग तो दूसरे की कमाई हुई रोटी खाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
युवा लोग किसी कार्य की समाप्ति पर थक जाते हैं और वृद्ध कार्य के प्रारम्भ में ही थक जाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
असफलताएँ कभी-कभी सफलता का आधार होती हैं, यदि हम अनेक बार भी असफल होते हैं तो कोई बात नहीं, प्रयत्न करके असफल हो जाने की अपेक्षा प्रयत्न न करना अधिक अपमानजनक है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो व्यक्ति अपने सामने कोई बड़ा उद्देश्य नहीं रखता है, वह जीवन भर केंचुए की ही चाल में रेंगता रह जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
संकट उपस्थित होने पर भी जिसकी बुद्धि विचलित नहीं होती है वह कार्य में सफल हो जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यदि तुम जीवन में सफलता पाना चाहते हो तो धैर्य को अपना घनिष्ठ मित्र, अनुभव को अपना परामर्श दाता, सावधानी को अपना बड़ा भाई और आशा को अपनी संरक्षक प्रतिभा बना लो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
प्रतिष्ठा, आलसियों और अपाहिजों की तरह दूसरों के बल पर जीने में नहीं है, वह है अपना काम स्वयं करने में और सच्चाई–ईमानदारी से अपना पसीना बहाकर रोटी कमाने में। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जितने महान् कार्य साहस के बल पर किए जाते हैं, उतने केवल बुद्धिमत्ता के बल पर नहीं किए जाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
शिक्षित बनना प्रत्येक मनुष्य के अपने हाथ की बात है, केवल सच्ची लगन तथा इच्छा शक्ति की दृढ़ता की ही आवश्यकता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यदि तुम एक भी दिन व्यर्थ नष्ट किए बिना समस्त जीवन सत्कर्म करने में बिताते हो, तो तुम आगामी जन्म–मरण का मार्ग बन्द किए देते हो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
साहसी पुरुष पराजित होने पर भी निरुत्साहित नहीं होते है हाथी तीखे बाणों के गहरे आघात होने पर भी अपने पैरों को और भी दृढ़ता से जमा देता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यह काम अशक्य हैं, ऐसा कहकर किसी भी काम से पीछे न हटो; क्योंकि पुरुषार्थ प्रत्येक काम में सिद्धि देने की शक्ति रखता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
किसी काम को अधूरा मत छोड़ो क्योंकि अधूरा काम करने वालों को जगत् में कोई नहीं चाहता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो सुख की चाह न कर कार्य को चाहता है; वह मित्रों का ऐसा आधार स्तम्भ है, जो मित्रों के दु:ख के आँसुओं को पोंछेगा। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आपत्तियों को जो 'आपत्ति' नहीं समझते, वे आपत्तियों को ही आपत्ति में डालकर वापस भेज देते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जब आपने अपनी सारी बुद्धिमत्ता से एक काम करने की ठान ली है, तो डगमगाना नहीं चाहिए, बल्कि लक्ष्य को शक्ति से प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ऐसे कार्यों के करने में जुट जाओ, जो अन्त में प्रसन्नता बढ़ाते है, चाहे तुम्हें ऐसा करने में अनेक कठोर दु:खों की पीड़ा उठानी पढ़े, अपने हृदय को कड़ा करो और अन्त तक दृढ़ रहो। पुरुषार्थ 0 – भेजें