Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Effort & Diligence

पुरुषार्थ

637 सूत्र · पृष्ठ 2 / 9

जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य एवं साहस से सामना किया जाए।
पुरुषार्थ
जगत् में कुछ मानव ऐसे भी होते हैं, जो पेड़-पौधों की तरह सब कुछ सहन कर पाते हैं।
पुरुषार्थ
कोई भी साधना जल्दी परिणाम नहीं दिखाती, साधना सब्र माँगती है।
पुरुषार्थ
साहस गया कि आधी समझदारी भी उसके साथ चली जाती है।
पुरुषार्थ
धीरज की चाल धीमी पर फल मीठा होता है।
पुरुषार्थ
सफलता के शिखर पर समर्थक कम और विरोधी ज्यादा मिलेंगे उन विरोधियों को सकारात्मक ऊर्जा से शांत करना और संतुलन बनाये रखना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
खुद पर भरोसा करना कोई परिंदों से सीखे क्योंकि जब वो शाम को वापस घोंसलों में जाते हैं तो उनकी चोंच में कल के लिए कोई दाना नहीं होता है।
पुरुषार्थ
सब कुछ खोने से बुरा क्या है? वो उम्मीद खोना जिसके भरोसे सब कुछ वापस पा सकते हैं। दुर्घटना को भी अवसर बनाना सीखना है, गिरो तो कुछ उठाकर ही उठना है।
पुरुषार्थ
दुनिया विरोध करे तुम डरो नहीं क्योंकि लोग फल-फूल से लदे वृक्ष को ही पत्थर मारते हैं।
पुरुषार्थ
सब्र और सच्चाई एक ऐसी सवारी है जो अपने सवार को गिरने नहीं देती ना किसी के कदमों में और न किसी की नजरों में।
पुरुषार्थ
साहस मानवीय गुणों में प्रमुख है क्योंकि वह बाकी सभी गुणों की गारंटी देता है, साहस सिर्फ खड़े होकर बोलना ही नहीं, बैठकर धैर्यपूर्वक सुनना भी है।
पुरुषार्थ
‘शोक’ धर्म, बुद्धि, शास्त्र ज्ञान, शरीर, जप, तप, संयम और शान्ति को नष्ट करता है। शोक से मुक्त होना है तो शौक करना छोड़ दो।
पुरुषार्थ
जब भी आप हार जायें उसे सफलता की ओर एक सीढ़ी मानें, जो कि आप तय कर चुके हैं।
पुरुषार्थ
कटा हुआ वृक्ष भी बढ़ता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुनः बढ़कर पूरा हो जाता है, इस बात को समझकर सन्त पुरुष अपनी विपत्ति में घबराते नहीं हैं।
पुरुषार्थ
आपत्ति पड़ने पर जो घबराता नहीं है, वह कल्याण को प्राप्त करता है।
पुरुषार्थ
अज्ञानी लोग छोटे काम ही आरम्भ करते हैं और अत्यन्त व्यग्र हो जाते हैं, बुद्धिमान लोग महान् कार्य हाथ में लेते हैं परन्तु व्याकुल नहीं होते हैं।
पुरुषार्थ
दुःख आ पड़ने पर मुस्कुराओ उसका सामना करके विजयी होने का साधन इसके समान और कोई नहीं है।
पुरुषार्थ
जो लुट जाने पर भी मुस्कुराता है, वह चोर का दिल चुरा लेता है।
पुरुषार्थ
किसी कार्य के लिए कला एवं विज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, उसमें धैर्य की भी आवश्यकता है।
पुरुषार्थ
धैर्यवान और बुद्धिमान मनुष्य को बहुविध शोक, विलाप और रुदन सभी अवस्थाओं में त्याग देने योग्य है।
पुरुषार्थ
धीर पुरुष कार्य प्रारम्भ कर दृढ़ता से करते हैं, छोड़ते नहीं हैं।
पुरुषार्थ
शक्ति भय के अभाव में रहती है, न कि मांस या पुट्ठों के गुणों में जो कि हमारे शरीर में होते हैं।
पुरुषार्थ
जिसमें धीरज है और जो मेहनत से नहीं घबराता कामयाबी उसकी दासी है।
पुरुषार्थ
बुद्धिमान वही है, जो पूरे संकल्प से कार्य को निपटाना जानता है।
पुरुषार्थ
कोई भी साधना जल्दी परिणाम नहीं दिखाती, साधना सब्र माँगती है।
पुरुषार्थ
धीर पुरुष कार्य प्रारम्भ कर दृढ़ता से करते हैं, छोड़ते नहीं हैं।
पुरुषार्थ
जो अधीर और असमर्थ होते हैं, उनमें उत्साह उत्पन्न नहीं होता, प्रायः उत्साही पुरुष ही राज्य सम्पत्ति का उपभोग करते हैं।
पुरुषार्थ
जब समय तुम्हारे प्रतिकूल हो तो बगुला की तरह अकर्मण्यता करो, लेकिन जब वह अनुकूल हो तो बगुले के समान ही झपटकर तेजी के साथ हमला करो।
पुरुषार्थ
अपने सामने एक ही साध्य रखना चाहिए, उस साध्य के सिद्ध होने तक दूसरी किसी बात की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए, रात-दिन सपने तक में उसी की धुन रहे, तभी सफलता मिलती है।
पुरुषार्थ
मनुष्य को प्रत्येक कार्य इतनी सतर्कता, साधना और निष्ठा से करना चाहिए मानो सम्पूर्ण सृष्टि का कल्याण उसी के कार्य की सफलता पर निर्भर है।
पुरुषार्थ
कार्य उसी का सिद्ध होता है, जो समय पर विचार कर कार्य करता है वह खिलाड़ी कभी नहीं हारता जो दाँव पर विचार कर लेता है।
पुरुषार्थ
अगर आप चाहते हैं कि कोई काम अच्छी तरह से हो, तो उसे खुद करें।
पुरुषार्थ
परिवर्तन से डरना और संघर्ष से कतराना मनुष्य की सबसे बड़ी कायरता है।
पुरुषार्थ
आलस्य सबसे अधिक विघ्नकारक है, आलस्य से देह और मन दोनों ही कमजोर होते हैं।
पुरुषार्थ
बिना आत्मविश्वास का आदमी उस बूँद के समान है जो समुद्र से दूर हो चुकी है और जिसका नष्ट होना निश्चित है।
पुरुषार्थ
आत्मविश्वास के अभाव में परमात्मा भी आपकी मदद नहीं कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
अपना कार्य इस तरह कीजिए कि वह आपकी पहचान बन जाए।
पुरुषार्थ
अपने कर्तव्य में प्रयत्नशील रहना और चुप रहना बदनामी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है।
पुरुषार्थ
योजना धैर्य से बनाइये और काम पूरी गति से कीजिए।
पुरुषार्थ
यदि पहली बार में सही काम करेंगे तो सीखेंगे कैसे?
पुरुषार्थ
जो छोटे-छोटे कामों के पीछे बहुत ज्यादा पड़े रहते हैं, वे अक्सर बड़े कामों के लिए नाकाबिल बन जाते हैं।
पुरुषार्थ
शुरूआत किसी भी कार्य का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।
पुरुषार्थ
खेती से दुर्भिक्ष नहीं होता, जाप से पाप नहीं होता, मौन से कलह नहीं होती और जागने से भय नहीं होता है।
पुरुषार्थ
बिना हथौड़े की चोट के पत्थर भी भगवान् नहीं बनता है।
पुरुषार्थ
जिस क्षण आप उन चीजों को करना छोड़ देते हैं जो आपको पर्वत के शिखर तक ले गयी उसी क्षण आप नीचे घाटी में गिरना शुरू कर देते हैं।
पुरुषार्थ
अगर आप जीवन में योजना बनाने में विफल रहे तो आपने विफल होने की योजना बना ली है।
पुरुषार्थ
तैयारी करने में फैल होना फैल होने की तैयारी करना है।
पुरुषार्थ
जिस व्यक्ति ने कभी गलती नहीं की उसने कभी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की है।
पुरुषार्थ
परिवर्तन को स्वीकार करने में भी सकारात्मक सोच और थोड़ा जोखिम लेने की क्षमता होना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
श्रेष्ठ परिणाम के लिए–सकारात्मक रवैया, आत्म विश्वास और कार्य योजना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
लोग गहरी नींद में सोये हों तो दहाड़ और चिंघाड़ आवश्यक है।
पुरुषार्थ
जहाँ हिम्मत समाप्त होती है वहाँ हार की शुरूआत होती है।
पुरुषार्थ
कार्य की सिद्धि पुरुषार्थ से होती है परन्तु होगी तभी जब भाग्य साथ देगा।
पुरुषार्थ
कार्य की सिद्धि चिंता से नहीं पुण्य एवं पुरुषार्थ से होती है।
पुरुषार्थ
प्रमाद से त्याग रूप धन नष्ट हो जाता है।
पुरुषार्थ
संकल्प से रहित व्यक्ति शून्य है पूर्ण नहीं, संकल्प के दृढ़ होने पर 'शक्ति' स्वयं आती है।
पुरुषार्थ
धैर्य के बिना लक्ष्मी नहीं मिलती, शूरता के बिना विजय नहीं मिलती, दान के बिना यश नहीं मिलता, ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं मिलता है।
पुरुषार्थ
लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पण आवश्यक है।
पुरुषार्थ
हमें जिन पर प्रहार करना चाहिए, वे शत्रु केवल ये हैं दरिद्रता, रोग, अज्ञान और भय।
पुरुषार्थ
उत्साह, सामर्थ्य और मन से हिम्मत न हारना; ये किसी भी कार्य की सिद्धि कराने वाले गुण कहे गये हैं।
पुरुषार्थ
लक्ष्य प्राप्ति के लिए सहज प्रवृत्तियों को भी होम कर देना होता है।
पुरुषार्थ
जो आलसी हैं, कायर हैं, अभिमानी हैं, लोक चर्चा से डरने वाले और सदा समय की प्रतीक्षा में बैठे रहने वाले हैं, ऐसे लोगों को अपने अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होती है।
पुरुषार्थ
मनुष्य पराक्रम के द्वारा दुःखों से पार होता है और प्रज्ञा से परिशुद्ध होता है।
पुरुषार्थ
कार्यों को प्रारम्भ न करना बुद्धि का पहला लक्षण है और प्रारम्भ किए हुए कार्य को पूरा करना दूसरा लक्षण है।
पुरुषार्थ
महत्वाकांक्षा की प्रेरणा मनुष्य को साहस, लगन और दृढ़ता प्रदान करती है, इन गुणों के अभाव में मानव निर्जीव हो जाता है।
पुरुषार्थ
जो कार्य किसी समय किए जाने की बात है, वह कभी भी नहीं किया जाएगा।
पुरुषार्थ
सफल और असफल होने वालों के बीच कोई अंतर नहीं होता, केवल यह अंतर होता है कि एक केवल शारीरिक परिश्रम करता है और दूसरा कार्य को बुद्धि और ध्यान को एकाग्र करके करता है।
पुरुषार्थ
अगर तुम एक समय में बहुत से काम करना चाहोगे तो तुम किसी भी काम में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकोगे।
पुरुषार्थ
वैभव असावधान लोगों के लिए नहीं है ऐसा संसार के सभी विज्ञजनों का अभिमत है।
पुरुषार्थ
अधूरा काम और पराजित शत्रु–ये दो बुझी चिंगारियों के समान हैं, वे समय पाकर बढ़ जाते हैं और असावधान आदमी को आ दबोचते हैं।
पुरुषार्थ
सुनने वाले लाखों है, सुनाने वाले हजारों हैं, समझने वाले सैकड़ों हैं परन्तु सत्कार्य करने वाले कोई विरले ही हैं, सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है जो सत्कर्म करते हैं।
पुरुषार्थ
दिन में मत सोओ, पुरुषार्थ करो दरिद्रता दूर हो जायेगी।
पुरुषार्थ
यदि कोई मनुष्य अपना कार्य नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफलता कदापि नहीं मिल सकती है।
पुरुषार्थ
हिरणों के भय से क्या खेती नहीं की जाती? अजीर्ण के भय से क्या भोजन छोड़ दिया जाता है? खटमलों के भय से क्या बिस्तर छोड़ दिये जाते हैं? अर्थात् नहीं, तो उसी प्रकार विघ्नों के भय से सज्जन पुरुष संयम (कर्त्तव्य) पथ को नहीं छोड़ते हैं।
पुरुषार्थ
शीघ्र करने योग्य कार्य को विलंब से किए जाने पर उसका महत्त्व (फल) नष्ट हो जाता है।
पुरुषार्थ