जब सामने आई परिस्थिति का सामना करना तय है तो क्यों न धैर्य एवं साहस से सामना किया जाए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सफलता के शिखर पर समर्थक कम और विरोधी ज्यादा मिलेंगे उन विरोधियों को सकारात्मक ऊर्जा से शांत करना और संतुलन बनाये रखना आवश्यक है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
खुद पर भरोसा करना कोई परिंदों से सीखे क्योंकि जब वो शाम को वापस घोंसलों में जाते हैं तो उनकी चोंच में कल के लिए कोई दाना नहीं होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सब कुछ खोने से बुरा क्या है? वो उम्मीद खोना जिसके भरोसे सब कुछ वापस पा सकते हैं। दुर्घटना को भी अवसर बनाना सीखना है, गिरो तो कुछ उठाकर ही उठना है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
दुनिया विरोध करे तुम डरो नहीं क्योंकि लोग फल-फूल से लदे वृक्ष को ही पत्थर मारते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सब्र और सच्चाई एक ऐसी सवारी है जो अपने सवार को गिरने नहीं देती ना किसी के कदमों में और न किसी की नजरों में। पुरुषार्थ 0 – भेजें
साहस मानवीय गुणों में प्रमुख है क्योंकि वह बाकी सभी गुणों की गारंटी देता है, साहस सिर्फ खड़े होकर बोलना ही नहीं, बैठकर धैर्यपूर्वक सुनना भी है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
‘शोक’ धर्म, बुद्धि, शास्त्र ज्ञान, शरीर, जप, तप, संयम और शान्ति को नष्ट करता है। शोक से मुक्त होना है तो शौक करना छोड़ दो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कटा हुआ वृक्ष भी बढ़ता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुनः बढ़कर पूरा हो जाता है, इस बात को समझकर सन्त पुरुष अपनी विपत्ति में घबराते नहीं हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अज्ञानी लोग छोटे काम ही आरम्भ करते हैं और अत्यन्त व्यग्र हो जाते हैं, बुद्धिमान लोग महान् कार्य हाथ में लेते हैं परन्तु व्याकुल नहीं होते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
दुःख आ पड़ने पर मुस्कुराओ उसका सामना करके विजयी होने का साधन इसके समान और कोई नहीं है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
किसी कार्य के लिए कला एवं विज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, उसमें धैर्य की भी आवश्यकता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
धैर्यवान और बुद्धिमान मनुष्य को बहुविध शोक, विलाप और रुदन सभी अवस्थाओं में त्याग देने योग्य है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
शक्ति भय के अभाव में रहती है, न कि मांस या पुट्ठों के गुणों में जो कि हमारे शरीर में होते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो अधीर और असमर्थ होते हैं, उनमें उत्साह उत्पन्न नहीं होता, प्रायः उत्साही पुरुष ही राज्य सम्पत्ति का उपभोग करते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जब समय तुम्हारे प्रतिकूल हो तो बगुला की तरह अकर्मण्यता करो, लेकिन जब वह अनुकूल हो तो बगुले के समान ही झपटकर तेजी के साथ हमला करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अपने सामने एक ही साध्य रखना चाहिए, उस साध्य के सिद्ध होने तक दूसरी किसी बात की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए, रात-दिन सपने तक में उसी की धुन रहे, तभी सफलता मिलती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
मनुष्य को प्रत्येक कार्य इतनी सतर्कता, साधना और निष्ठा से करना चाहिए मानो सम्पूर्ण सृष्टि का कल्याण उसी के कार्य की सफलता पर निर्भर है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कार्य उसी का सिद्ध होता है, जो समय पर विचार कर कार्य करता है वह खिलाड़ी कभी नहीं हारता जो दाँव पर विचार कर लेता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
बिना आत्मविश्वास का आदमी उस बूँद के समान है जो समुद्र से दूर हो चुकी है और जिसका नष्ट होना निश्चित है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अपने कर्तव्य में प्रयत्नशील रहना और चुप रहना बदनामी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो छोटे-छोटे कामों के पीछे बहुत ज्यादा पड़े रहते हैं, वे अक्सर बड़े कामों के लिए नाकाबिल बन जाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
खेती से दुर्भिक्ष नहीं होता, जाप से पाप नहीं होता, मौन से कलह नहीं होती और जागने से भय नहीं होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिस क्षण आप उन चीजों को करना छोड़ देते हैं जो आपको पर्वत के शिखर तक ले गयी उसी क्षण आप नीचे घाटी में गिरना शुरू कर देते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
परिवर्तन को स्वीकार करने में भी सकारात्मक सोच और थोड़ा जोखिम लेने की क्षमता होना आवश्यक है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
संकल्प से रहित व्यक्ति शून्य है पूर्ण नहीं, संकल्प के दृढ़ होने पर 'शक्ति' स्वयं आती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
धैर्य के बिना लक्ष्मी नहीं मिलती, शूरता के बिना विजय नहीं मिलती, दान के बिना यश नहीं मिलता, ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं मिलता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
उत्साह, सामर्थ्य और मन से हिम्मत न हारना; ये किसी भी कार्य की सिद्धि कराने वाले गुण कहे गये हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो आलसी हैं, कायर हैं, अभिमानी हैं, लोक चर्चा से डरने वाले और सदा समय की प्रतीक्षा में बैठे रहने वाले हैं, ऐसे लोगों को अपने अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कार्यों को प्रारम्भ न करना बुद्धि का पहला लक्षण है और प्रारम्भ किए हुए कार्य को पूरा करना दूसरा लक्षण है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
महत्वाकांक्षा की प्रेरणा मनुष्य को साहस, लगन और दृढ़ता प्रदान करती है, इन गुणों के अभाव में मानव निर्जीव हो जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सफल और असफल होने वालों के बीच कोई अंतर नहीं होता, केवल यह अंतर होता है कि एक केवल शारीरिक परिश्रम करता है और दूसरा कार्य को बुद्धि और ध्यान को एकाग्र करके करता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अगर तुम एक समय में बहुत से काम करना चाहोगे तो तुम किसी भी काम में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकोगे। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अधूरा काम और पराजित शत्रु–ये दो बुझी चिंगारियों के समान हैं, वे समय पाकर बढ़ जाते हैं और असावधान आदमी को आ दबोचते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सुनने वाले लाखों है, सुनाने वाले हजारों हैं, समझने वाले सैकड़ों हैं परन्तु सत्कार्य करने वाले कोई विरले ही हैं, सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है जो सत्कर्म करते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यदि कोई मनुष्य अपना कार्य नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफलता कदापि नहीं मिल सकती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हिरणों के भय से क्या खेती नहीं की जाती? अजीर्ण के भय से क्या भोजन छोड़ दिया जाता है? खटमलों के भय से क्या बिस्तर छोड़ दिये जाते हैं? अर्थात् नहीं, तो उसी प्रकार विघ्नों के भय से सज्जन पुरुष संयम (कर्त्तव्य) पथ को नहीं छोड़ते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
शीघ्र करने योग्य कार्य को विलंब से किए जाने पर उसका महत्त्व (फल) नष्ट हो जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें