Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Character

चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 9 / 15

जिन मूल्यों के लिए जान दी जा सकती है, उन्हीं के लिए जीना सार्थक है।
चरित्र
निष्कलंक का ही जीवन है, यश हीन का जीवन मरण तुल्य है।
चरित्र
बुद्धिमानों की परीक्षा संकट काल में होती है और शूरों की संग्राम में होती है।
चरित्र
सद्गुणों को पाने के लिए प्रयत्न करो बाहरी आडम्बरों से क्या लाभ, ठांठ गाय केवल गले में घंटी बाँधने से ही नहीं बिकती है।
चरित्र
छोटी–छोटी बातों के लिए दूसरों का मुँह ताँकना, समर्थ होने पर भी अपना काम स्वयं न करना गर्व की बात नहीं है, बल्कि स्वावलम्बी होना निश्चय ही गर्व की बात है।
चरित्र
पुरुष का सच्चा पुरुषत्व तो इसी में है कि जिसमें उसने जन्म लिया है उस वंश को धन में, बल में, ज्ञान में ऊँचा बना दे।
चरित्र
अपना जीवन उस फूल के समान बनाओ जो अपने मसलने वाले हाथों को भी सुगंधी से भर देता है।
चरित्र
दूध का सार मलाई है और जीवन का सार भलाई है।
चरित्र
सच है, धनवान मरता है तो सिर्फ घर वाले रोते हैं मगर इंसान जब मरता है तो दुनिया वाले रोते हैं।
चरित्र
कार्बन पेपर बनो कि अपनी छाप दूसरों पर छोड़ दो।
चरित्र
जीवन में वे कार्य अवश्य कीजिए जिन्हें आप मृत्यु के बाद भी याद रखवाना चाहते हैं।
चरित्र
सुन्दरता व गुणों की ओर सभी आकर्षित होते हैं, पर कुरूप व अयोग्य को अपनाना दुर्लभ गुण है। दुर्गुणों को सद्गुण की सेवा में लगा दें तो सारे दुर्गुण सद्गुण हो जाएँगे।
चरित्र
जो बलवान होकर निर्बलों की रक्षा करता है, वही सच्चा मानव कहलाता है।
चरित्र
दुष्ट लोग शारीरिक बल का उपयोग दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए करते हैं और सज्जन लोग हानि व कष्ट से बचाने के लिए करते हैं।
चरित्र
हाथ में श्रेष्ठ संयमोपकरण, शिर से गुरु चरणों में प्रणाम, मुख में सत्यवाणी, विजयी भुजाओं में अतुल बल, हृदय में पवित्रता, ईश्वर के ध्यान में तत्पर करा देने वाला शास्त्र अध्ययन; ये सब ऐश्वर्य के बिना ही स्वभावतः महापुरुषों के आभूषण हैं।
चरित्र
सद्व्यवहार में शक्ति है, जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है। ''दृढ़ इच्छा शक्ति ही व्यक्ति को महान् बनाती है।''
चरित्र
बुरे स्वभाव से अपने लिए नरक न बनाए। अपने स्वभाव से दूसरों के लिए स्वर्ग बनाए।
चरित्र
मूर्ति की तरह अपने आप को सुन्दर बनाओ रुको मत।
चरित्र
जो व्यक्ति छोटे कामों को ईमानदारी से करता है, वही बड़े कामों को ईमानदारी से कर सकता है।
चरित्र
हमें अपने आपको नहीं, अपने उत्तर दायित्वों को गंभीरता से लेना चाहिए।
चरित्र
उपदेश करो अपने लिए, तभी तुम्हारा उपदेश सार्थक होगा। जो दूसरों से करवाना चाहते हो, उसे पहले स्वयं करो; नहीं तो तुम्हारा उपदेश नाटक के अभिनय के सिवा और कुछ भी नहीं है।
चरित्र
मानव की वाणी की अपेक्षा उसका कर्म अधिक अच्छा नेतृत्व कर सकता है।
चरित्र
बुराई में रस लेना बुरी बात है किन्तु अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और बुरी बात है।
चरित्र
विचारों का सम्मान होता है पर आचरण की पूजा होती है।
चरित्र
रूप तो सिर्फ आँखों तक ही पहुँचता है जबकि गुण सीधे आत्मा तक पहुँचते हैं।
चरित्र
अच्छा स्वभाव सदा सौन्दर्य के अभाव को पूरा कर देता है किन्तु सौन्दर्य अच्छे स्वभाव के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकता है।
चरित्र
संस्कार बिना सुविधाएँ पतन का कारण हैं।
चरित्र
नैतिक व्यक्ति धार्मिक हो जरूरी नहीं किन्तु हर धार्मिक व्यक्ति नैतिक होता है।
चरित्र
दुर्जन और सज्जन सुई की नोक और पीछे के भाग के समान आचरण करते हैं। एक तो छेद करता है और दूसरा (पीछे का भाग) गुणवान् (धागे वाला) होने से छेद को बंद कर देता है।
चरित्र
सत्ता बुरी नहीं सत्ता का नशा बुरा है।
चरित्र
दो ही चीजें मनुष्य को दु:खी करती हैं–एक वस्तु का अभाव और दूसरा बुरा स्वभाव।
चरित्र
प्रेम ईमानदारी व स्वार्थ बेईमानी सिखाता है।
चरित्र
जीवन का आनंद, गौरव, सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने में है।
चरित्र
हम व्यक्ति को अपने व्यवहार से पानी–पानी भी कर सकते हैं और वक्त पर तूफानी भी कर सकते हैं।
चरित्र
अपने अवगुण अपने को ही तकलीफ देते हैं।
चरित्र
किसी की गलती तो कोई मूर्ख भी बता सकता है पर उसकी अच्छाई को पहचानने के लिए खुद का अच्छा होना जरूरी है।
चरित्र
हर व्यक्ति को स्वावलम्बी और स्वतंत्र होना चाहिए।
चरित्र
सुसंस्कारों से उत्थान हो सकता है तो कुसंस्कारों से पतन भी हो सकता है।
चरित्र
सुसंस्कारों से ही शिल्पी पत्थर में परमात्मा की प्रतिमा प्रकट कर देता है और मंत्र संस्कारों से गुरु उस पत्थर की प्रतिमा को पूज्य बना देते हैं।
चरित्र
संस्कार हीन सौ कौरवों से एक संस्कारवान युधिष्ठिर अच्छा है।
चरित्र
इन्तजार ईमानदारी की पहचान है।
चरित्र
जब तक दुष्टता का अवसर नहीं मिलता तब तक सभी सज्जन दिखते हैं।
चरित्र
जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को क्षति पहुँचाये, वह दुष्ट है।
चरित्र
मूर्ति की तरह जिन्दगी भी सब तरफ से सुन्दर होनी चाहिए।
चरित्र
अपराध करने के पश्चात् भय पैदा होता है और यही उसका दंड है। अपने दोष को स्वीकारना कोई अपमान नहीं है।
चरित्र
असली रूप तो अपने गुणों से ही झलकता है। अपनी छाप गुणवान होकर डालना चाहिए, रूपवान होकर नहीं।
चरित्र
इंसान को ईमानदार मजबूरी में नहीं मजबूती से बनना चाहिए।
चरित्र
यदि आप किसी के उपकार का बदला उपकार से नहीं चुका सकते तो कम से कम अपकार से तो न चुकाये।
चरित्र
किसी व्यक्ति ने हमारी आपत्ति में सहायता की हो ऐसे व्यक्ति की आपत्ति में हम भी सहायता कर दें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है उपकारी पर उपकार करना यह तो सज्जनता का लक्षण है परन्तु है अपकारी पर भी उपकार करना यह तो महापुरुष का लक्षण है।
चरित्र
विद्या का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण होना चाहिए।
चरित्र
ढोंग से नहीं ढंग से जिओ।
चरित्र
जो बच्चों को सिखाते हैं उस पर स्वयं अमल करें तो यह संसार स्वर्ग बन जाये।
चरित्र
शालीनता ऊँचे अध्ययन से नहीं अच्छे संस्कारों से आती है, हमारी शालीनता दूसरों के लिए आदर्श बन जाती है।
चरित्र
संस्कार के बिना कोई महान् नहीं बन सकता है।
चरित्र
किसी व्यक्ति की संस्कृति का पता इस बात से चलता है कि वह झगड़े के समय कैसा आचरण करता है।
चरित्र
अच्छे संस्कार वे रीतियाँ हैं, जो योग्यता प्रदान करती है।
चरित्र
बचपन के संस्कार जीवन में वृद्धावस्था तक निरंतर मार्गदर्शन करते हैं।
चरित्र
हम शिक्षा से पैसा कमा सकते हैं लेकिन जीवन में नैतिक मूल्य सिद्धान्त, आचरण केवल संस्कारों से ही पा सकते हैं।
चरित्र
हमारे संस्कार हमारी नींव हैं, हमारी धरोहर है इसलिए देश का हर बच्चा संस्कारित हो यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
चरित्र
संसार में उपकारी और कृतज्ञ व्यक्ति दुर्लभ हैं।
चरित्र
जो विद्या और सदाचार से सम्पन्न है वह सब देवताओं और मनुष्यों में श्रेष्ठ है।
चरित्र
सुन्दर वह जो सुन्दर कार्य करें।
चरित्र
जो अपने नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे उत्तम, जो पिता के नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे मध्यम, जो मामा के नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे अधम और जो श्वसुर के नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे अधमाधम मनुष्य हैं।
चरित्र
कुलीन व्यक्ति में प्रसन्न मुख, दान, मधुर बोल तथा दूसरों की निंदा न करना ये चारों गुण स्वाभाविक होते हैं।
चरित्र
आज पूरे विश्व में हमारी संस्कृति की अलग ही पहचान है तो संस्कारों से, हमारी शिक्षा पर तो पाश्चात्य संस्कृति ने कब्जा कर लिया है लेकिन हमारे संस्कारों को हमें जीवित रखना होगा।
चरित्र
सज्जन प्रत्यक्ष और परोक्ष में समान व्यवहार करते हैं।
चरित्र
सदाचार से हीन मनुष्य का केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता है क्योंकि नीच कुल में उत्पन्न मनुष्य का भी सदाचार श्रेष्ठ माना जाता है।
चरित्र
आचारवान पुरुष ही आयु, धन, पुत्र, शौर्य, धर्म तथा शाश्वत भगवद् धाम एवं यहाँ पर विद्वत् समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।
चरित्र
एक भी बड़ा दोष समस्त गुण समूह को दूषित कर देता है।
चरित्र
किसी व्यक्ति की सभा में बैठकर तो उससे ईर्ष्या रखने वाले भी उच्च स्वर में उसकी प्रशंसा कर देते हैं परन्तु विद्वान् मनुष्य को उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। सच्चा सौहार्द वह होता है जब पीठ पीछे प्रशंसा की जाये।
चरित्र
सरस और कोमल स्वभाव के लोग नीरस और निष्ठुर मन वालों को भी उस प्रकार खींच लेते हैं जैसे चुम्बक लोहे को खींच लेता है।
चरित्र
सज्जन आत्मीयता से देखते हैं तो सब दुःख हर लेते हैं और आत्मीयता से बोलते है तो सब सुख प्रदान करते हैं।
चरित्र
अत्याचारी, सबसे अधिक स्वयं के प्रति अत्याचारी होता है।
चरित्र
थोड़ा-सा ऐश्वर्य पाकर भी दुष्ट व्यक्ति प्रायः अभिमानी हो जाता है, परन्तु बहुत ऐश्वर्य पाकर भी सज्जन शांत ही रहता है।
चरित्र
अकुलीन हो या कुलीन जो मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, धर्म में तत्पर रहता है, मृदु है, जितेन्द्रिय है, वह सैकड़ों कुलीनों से बढ़कर है।
चरित्र