Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 8 / 15

जीवन का आनंद, गौरव-सम्मान व स्वाभिमान के साथ जीने में हैं।
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पहाड़ से गिरकर मनुष्य उठ सकता है परन्तु नजरों से गिरा हुआ कभी नहीं उठ सकता है।
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दिमाग को ठंडा, जेब को गरम, जुबान को नरम और दिल में रहम व आँखों में शरम रखने वाला हर जगह आदर पाता है।
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यदि गुण न हों तो रूप व्यर्थ है, विनम्रता न हो तो ज्ञान व्यर्थ है, उपयोग न आये तो धन व्यर्थ है, साहस न हो तो शस्त्र व्यर्थ हैं और यदि परोपकार न हो तो जीवन ही व्यर्थ है।
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एक अच्छा इंसान बनें और प्रतिज्ञा करें कि छोटों के साथ नरमी से, बड़ों के साथ करुणा से, संघर्ष करने वालों के साथ हमदर्दी से और कमजोर व गलती करने वालों के साथ सहनशीलता से पेश आयें क्योंकि हम अपने जीवन में कभी न कभी इनमें से किसी न किसी स्थिति से गुजरते हैं।
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अधम पुरुषों को जीविका न होने से भय लगता है, मध्यम श्रेणी के मनुष्यों को मृत्यु से भय होता है परन्तु उत्तम पुरुषों को अपमान से ही महान् भय होता है।
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पद से व्यक्ति की गरिमा नहीं किन्तु व्यक्ति से पद की गरिमा बढ़नी चाहिए।
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अधिकार प्राप्त कर न्याय न भूलें, धन प्राप्त कर धर्म न भूलें, पति-पत्नी पाकर परमात्मा को न भूलें, सम्पत्ति पाकर संतों को न भूलें, साधन पाकर साधना को न भूलें, गुमान में आकर ग्रन्थों को न भूलें, पदार्थ को पाकर परमार्थ को न भूलें, सब कुछ पाकर सज्जनता–सदाचरण को न भूलें अन्यथा भविष्य बिगड़ जाएगा।
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सरलता, विनयशीलता, दयालुता, सहिष्णुता इन्हीं चार स्तम्भों पर मनुष्यता का महल टिका है, जिस मनुष्य में इन चार गुणों में से किसी एक गुण की भी कमी आती है, तो समझ लो उसकी मनुष्यता तीन पाये की कुर्सी की तरह है।
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भूल का अर्थ अज्ञानता या अपराध नहीं, भूल हो जाना एक सहज प्रक्रिया है, पर उस भूल को सुधार कर बेहतर बनने की भावना मन में होना चाहिए।
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जो भूल को भूल नहीं मानता उसकी भूल जीवन में शूल बन जाती है।
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सफलता के कदम पर चलने के लिए उन कदमों द्वारा मत चलिए जिन्हें दूसरे शब्दों में गुस्सा, बेईमानी और अनादर कहते हैं।
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मजदूर का पसीना सूखे, उससे पहले उसे उसका मेहनताना दे दीजिए।
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एक अवगुण छुपाने के लिए अनेक आडम्बर का क्लेश करने की अपेक्षा छोटा परिश्रम तो यह है कि उस एक अवगुण को ही मिटा दिया जाय।
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जो पुरुष अपने पद के विरुद्ध कार्य न करेगा, वह निःशल्य और प्रसन्न रहेगा।
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अपनी कमियों को पहचाने और स्वयं सुधारें, आपका सुधार देखकर अन्य खुद को सुधारने की कोशिश करेंगे।
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हमारा जीवन स्वयं के सिद्धान्तों पर है, लोगों के कहने पर नहीं।
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विपरीत परिस्थितियों में भी जो ईमान, साहस और धैर्य को कायम रख सके वस्तुतः वही सच्चा शूरवीर है।
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कठिन परिस्थितियाँ एक वाशिंग मशीन की तरह होती हैं, जो हमें ठोकर मारती, घुमाती हैं और निचोड़ती भी है पर आखिर में जब हम इनसे बाहर आते हैं, तो हमारा व्यक्तित्व पहले की अपेक्षा अधिक साफ चमकीला और बेहतर होता है।
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लोग क्या कहते हैं इस पर ध्यान मत दो, सिर्फ यह देखो कि जो करने योग्य था वह बन पड़ा या नहीं। नेक बनने के लिए ऐसी कोशिश करो जैसी खूबसूरत दिखने के लिए करते हो।
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अपना आदर्श उपस्थित करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है।
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कर्म से ही पहचान होती इंसान की दुनिया में, अच्छे कपड़े तो बे-जान पुतलों को भी पहनाये जाते हैं दुकानों में।
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दीपक बोलता नहीं उसका प्रकाश परिचय देता है, ठीक उसी प्रकार आप अपने अच्छे कर्म करते रहें वही आपका परिचय देंगे।
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जब सड़क का पत्थर मन्दिर का देवता बन जाता है तो हम इंसान क्यों नहीं बन सकते हैं।
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आप अपने भविष्य को नहीं बदल सकते हैं परन्तु अपनी आदतें अवश्य बदल सकते हैं, आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देंगी।
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किसी के गुणों की प्रशंसा करने के साथ उन गुणों को अपनाने का प्रयत्न भी करें।
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कुछ अलग करना है तो जरा भीड़ से हटकर चलो क्योंकि भीड़ साहस तो देती है लेकिन पहचान छीन लेती है।
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वचन चाहे कितने भी श्रेष्ठ क्यों न हो किन्तु दुनिया हमारे कर्मों से ही पहचानती है।
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जो जिम्मेदारी मिले उसे सम्मानपूर्वक निभाना मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य है।
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जब आप पैदा हुए थे तब आप रोये थे और दुनिया हँसी थी किन्तु जिन्दगी में ऐसे काम करो कि जाते वक्त आप हँसो और दुनिया रोये।
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मन की निर्मलता, सरलता एवं सहनशीलता ही साधुता है।
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अपना व्यवहार मर्यादा और गरिमानुरूप होना चाहिए।
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विचारों की पवित्रता चारित्र की रक्षा करती है।
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मानव स्वभाव एक उपार्जित गुण है, शिक्षा, सत्संग और प्रेम से बदला जा सकता है।
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देने में उदारता, वचनों में मधुरता, आचरण में विवेक होना ही चाहिए।
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अपने आपको अच्छा बना लीजिए दुनिया से एक बुरा इंसान कम हो जायेगा।
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साहस भय पर विजय प्राप्त करने का नाम है।
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संसार में साहस ही सब कुछ है, साहस गया तो सब कुछ गया।
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यदि आप किसी को सुधारना चाहते हो तो पहले स्वयं को सुधारना होगा।
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उपदेशक बनने से पहले स्वयं आस्थावान होना आवश्यक है।
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जीत निश्चित हो तो कायर भी लड़ सकता है, बहादुर तो वो कहलाता है, जो हार निश्चित होने पर भी मैदान नहीं छोड़ता है।
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जो मनुष्य रोग, क्लेश, मद, उन्माद तथा समस्त दुःखदायक परीषहों से पीड़ित होने पर भी स्वीकृत चारित्र को नहीं छोड़ते हैं वे स्तुत्य हैं।
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जो नेत्र, मन, वाणी और कर्म इन चारों से संसार को प्रसन्न करता है, उसी से संसार प्रसन्न रहता है।
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सज्जन अपनी उपयोगिता कार्य से बताते हैं, कंठ से नहीं बताते हैं।
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आचार्य कहते हैं तृष्णा को नष्ट कर, क्षमा को धारण कर, पाप में अनुराग मत कर, सत्य बोल, सत्पुरुषों के पीछे चल, विद्वानों की सेवा कर, माननीयों का आदर कर, शत्रुओं से भी प्रेम कर, पीड़ितों को प्रश्रय दे, कीर्ति बढ़ा और दुःखित पर दया कर ये ही सब कार्य सत् पुरुषों के होते हैं।
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यदि तुम सच्चे सुधारक बनना चाहते हो, तो तीन बातों की आवश्यकता है प्रथम तो यह कि तुम्हारी हृदय भावना शील हो, दूसरी बात यह कि इन सबके लिए क्या तुमने कोई उपाय ढूँढ़ निकाला है या नहीं? तीसरा अटल अध्यवसाय यदि ये तीनों गुण आप में हैं तो वास्तव में आप एक सच्चे सुधारक मार्ग प्रदर्शक गुरु एवं मनुष्य जाति के लिए वरदान स्वरूप हैं।
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सामने वाले आदमी में जिस गुण की कमी है, उस सद्गुण के प्रत्यक्ष दर्शन उसे अपने व्यवहार द्वारा करा देना ही उसकी बड़ी से बड़ी सेवा है।
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ऐसा स्वभाव हो कि सामने वाला कहे कि तेरी याद में जो आनंद मुझे प्राप्त होता है, उसने सारे संसार के आनंद को अपने पैरों से रौंद डाला है।
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जब-तक अन्तःकरण दिव्य और उज्ज्वल न हो तब तक, वह व्यक्ति प्रकाश का प्रतिबिम्ब दूसरों पर नहीं डाल सकता है।
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हम अपने विषय में धारणा इस आधार पर बनाते हैं कि हम क्या करने के योग्य हैं, दूसरे लोग हमारा मूल्यांकन हमने जो कुछ किया है उससे करते हैं।
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कर्त्तव्य निष्ठ पुरुष कभी निराश नहीं होता है।
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शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक पुकार-पुकार कर उपदेश देते हैं।
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यह जगत् का निजी अनुभव है कि आधी छटाँक भर आचरण का जितना फल होता है उतना मन भर भाषणों अथवा लेखों का नहीं होता है।
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जिसे करना उचित नहीं है उसे प्राणों के कंठ में आ जाने पर भी नहीं करना चाहिए और जो करणीय है उसे प्राण संकट उपस्थित होने पर भी करना चाहिए।
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प्रत्येक व्यक्ति अपने क्षेत्र में महान् है, परन्तु एक का कर्त्तव्य दूसरे का कर्त्तव्य नहीं हो सकता है।
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जो स्वजनों पर उदारता, सेवकों पर दया, दुर्जन के साथ माध्यस्थता, सज्जन के साथ प्रीति, राजा के साथ नीति, विद्वानों के साथ सरलता, शत्रुजनों के साथ शौर्य, गुरुजनों के साथ क्षमा और स्त्रियों के साथ चतुरता का व्यवहार करते हैं और कला कुशल है, उन्हीं पुरुषों पर यह जगत् स्थित है।
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शील, ज्ञान वृद्धों का उपदेश, बहुश्रुतता, धर्मानुकूल आचरण और अनाशक्ति ये उन्नति के द्वार हैं।
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प्रेम, लज्जा, सहयोग, दयार्द्रता तथा सत्यवचन ये पाँच शान्ति के स्तम्भ हैं।
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अपने भीतर छुपे इन गुणों को प्रकट करो–ईमानदारी, गंभीरता, परिश्रम, भोग से अरुचि, सन्तुष्टि, उदारता, स्पष्टवादिता और चरित्रबल।
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कृतघ्न, दुराचारी, अत्यन्त क्रोधी और कपटी–चाण्डालों के ये चार प्रकार हैं, पाँचवें प्रकार का चाण्डाल जन्म से होता है।
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जो उद्योगी, सचेत, शुचि कर्म वाला, सोचकर काम करने वाला, संयत, धर्मानुसार जीविका वाला और अप्रमादी है उसका यश बढ़ता है।
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व्यवहार की छोटी-छोटी बातें ही व्यक्ति के चरित्र का दर्पण होती हैं, न कि लम्बी चौड़ी बातें। मनुष्यों के कार्य उनके विचारों के सर्वोत्तम व्याख्याता हैं।
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कुलीनता पूर्व जन्म के कर्मों का फल है, चारित्र इस जन्म के कर्मों का प्रकाशक है।
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मैं नहीं जानता कि मेरे बाबा कौन थे, मुझे यह जानने की चिंता अधिक है कि उनका पौत्र क्या बनेगा?
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गलती करना मनुष्य का काम है पर जान-बूझकर गलती पर जमे रहना शैतान का काम है।
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जैसे मैले वस्त्रों वाला जहाँ-कहीं भी बैठ जाता है, उसी प्रकार बिगड़े चरित्र वाला व्यक्ति भी अपने शेष चरित्र की रक्षा नहीं करता है।
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नीतिज्ञ के लिए अपना लक्ष्य ही सब कुछ है, गौरव सम्पन्न प्राणियों के लिए अपना चरित्र बल ही सर्व प्रधान है।
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आत्म त्याग, प्रेम तथा कर्त्तव्य से प्रेरित होकर किए गए छोटे-बड़े कार्यों से ही चरित्र का निर्माण होता है।
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महान् सुयश के अतिरिक्त अन्य कोई स्थायी सम्पत्ति संसार में नहीं है।
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यश की अपेक्षा योग्यता अधिक महत्त्वपूर्ण है।
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जो मनुष्य अपनी उन्नति चाहता है, उसे चाहिए कि वह दूसरों के गुण देखने की आदत डाले।
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आप दूसरों को तभी ऊपर उठा सकते हो, जब आप स्वयं ऊपर उठ चुके हो।
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जो गुणवान है वही जीवित है। जो धार्मिक है, वही जीवित है। जो गुण व धर्म से रहित है, उसका जीवन निष्फल है।
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जीवन वही है जो परतंत्र न हो।
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जिसका वृत्तान्त सुनकर तथा जिसका स्मरण करने पर प्राणियों को आनन्द होता है, उसी का जीवन शोभा देता है।
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