Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Character

चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 7 / 15

धूर्त होने से मूर्ख होना अधिक अच्छा है।
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उदाहरण प्रस्तुत करना उपदेश देने से अच्छा है।
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एक बुराई दूसरी बुराई को जन्म देती है।
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जो मनुष्य भलाई के बदले में बुराई करता है, उसके मन में बुराई सदा निवास करती है।
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स्वयं की बुराई को छिपाने से वह पनपती और बढ़ती है।
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बुराई नौका में छिद्र में समान है, वह छोटी हो या बड़ी, एक दिन नौका को डुबो देती है।
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जरूरी नहीं कि जो रूप में ठीक हो वह सद्गुण सम्पन्न भी हो।
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अच्छा स्वभाव सदा सौन्दर्य के अभाव को पूरा कर देगा किन्तु सौन्दर्य अच्छे स्वभाव के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकता है।
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बिना सद्गुण के सुंदरता अभिशाप है।
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सर्वोत्तम मनुष्य त्रुटियों से ढलकर ही निकलते हैं।
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जो गलती करता है वह मनुष्य है। जिसे गलती पर दुःख है वह संत है, जिसे गलती का घमंड है, वह शैतान है।
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दूसरों की त्रुटियाँ सुनकर प्रसन्न होने वाला अपनी बुराईयाँ सुनकर क्षुब्ध होगा।
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जो व्यक्ति मानव समुदाय के सामने आने में डरते हैं और अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने में असमर्थ हैं, वे जीवित होकर भी मृतकों से भी गये बीते हैं।
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जो लोग अपना अपमान करने वालों का गर्व चूर्ण नहीं करते, वे वास्तव में बहुत समय तक नहीं टिकेंगे।
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उच्च कुल में उत्पन्न होने पर भी यदि कोई सच्चरित्र नहीं है तो वह उच्च नहीं हो सकता और हीनवंश में जन्म लेने मात्र से ही कोई पवित्र आचार वाला नीच नहीं हो सकता है।
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बड़प्पन सदैव ही दूसरों के दोषों को ढँकने के यत्न में रहता है, पर ओछापन दूसरों के दोषों को खोजने के सिवाय और कुछ करना ही नहीं जानता है।
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वीरता भलाई करने में नहीं है, प्रत्युत किसी की भी बुराई न करने में है।
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शीलवान, चरित्रवान सन्तों का उपहास उड़ाने से चरित्र हीन सन्तान उत्पन्न होती है।
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जुआ के साथ विषाद (खेद), कलह, झगड़ा (बंधन), क्रोध, मान, मायाचारी (बुद्धिभ्रम), चुगली, मत्सर और शोक ये नौ अवगुण रहते हैं।
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जुआ से धर्म, लक्ष्मी, सुबुद्धि, सुख, सत्य, प्रतिष्ठा, शौच, श्रद्धा, विश्वास और सद्गति ये दसों नष्ट हो जाते हैं। जुआ अनेक अनर्थों को करने वाला है।
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छह तीखी तलवारें–अत्यधिक अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता और मित्र द्रोह ये मनुष्य की आयु को घटाती हैं।
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कामुक, चुगलखोर तथा दूसरों की बातों को छुपकर सुनने वाला व्यक्ति अपनी पोल अपने आप खोल देता है।
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निंदक आलोचक से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि हर नायक की पहचान खलनायक से ही होती है।
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जिसके पीछे खलनायक लग जाता है उस नायक का नाम अपने आप ऊँचा हो जाता है।
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हाथी को देखकर कुत्ते भौंकते हैं, पर कुत्ते को देखकर हाथी कभी नहीं भौंकता है।
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अपने कर्तव्य में प्रयत्नशील रहना और चुप रहना बदनामी का सबसे अच्छा उत्तर है।
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भला बनने के लिए हमें कुछ करने की जरूरत नहीं है, केवल बुराई सर्वथा छोड़ दें तो हम भले हो जायेंगे।
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गलती निकालने के लिए बुद्धि चाहिए, गलती स्वीकारने के लिए 'कलेजा' चाहिए, गलती करना पाप है, पर उसे छुपाना महापाप है।
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हर व्यक्ति से गलतियाँ होती हैं, लेकिन कुछ लोगों को गलतियाँ करने का शौक होता है जो एकदम बुरी बात है।
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वो बुलन्दियाँ व्यर्थ हैं जहाँ पहुँचने के लिए अपनों को ही रौंदा जाता है।
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पहले कपड़ों में गरीबी, आचरण में अमीरी होती थी, आज आचरण में गरीबी है, कपड़ों में अमीरी है।
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मनुष्य तभी तक वास्तविक गुणों का घर है, बुद्धिमान, सज्जन, प्रिय, शूरवीर, चरित्रवान, कलंकरहित, स्वाभिमानी, कृतज्ञ, पंडित, चतुर, धर्मरत, शील गुण सहित और प्रतिष्ठा से युक्त रहता है जब तक निष्ठुर वज्रपात के समान 'देहि' याचना का वचन नहीं कहता है।
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हर साल एक बुरी आदत को जड़ से खोदकर फेंका जाए तो कुछ ही साल में एक बुरे से बुरा आदमी भी भला इंसान बन सकता है।
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आदमी पहले नेक और ईमानदार बने फिर बाद में धर्मात्मा कहलाने का हकदार बने।
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शरीर को श्रमी, मन को संयमी, बुद्धि को विवेकशील, हृदय को अनुरागी (प्रेमी) और अपने आपको अहंकार शून्य बनाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति बनो।
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वही जीवित है जिसका मस्तिष्क ठंडा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।
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यदि आप में किसी को प्रभावित करने की क्षमता नहीं है तो अप्रभावित भी नहीं करना चाहिए।
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जहाँ पूज्यजनों का निरादर हो और अपूज्यजनों का आदर हो वहाँ दुर्भिक्ष, मरण और भय ये तीनों उपद्रव होते हैं।
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मानवीय गुणों और अवगुणों की ठीक-ठीक जाँच सदा उसके सत्कार्य से ही नहीं होती है, अपितु एक छोटा-सा कार्य, एक छोटी-सी बात, या एक छोटे-से परिहास से भी मानव के असली चरित्र पर काफी प्रकाश पड़ता है।
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गुणों से ही मनुष्य गौरव को प्राप्त होता है।
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कटुता, अपमान और दण्डों की मार की अपेक्षा प्रेम, स्नेह वात्सल्य से किया गया हृदय परिवर्तन स्थाई होता है।
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आचरण ही हमें साधु और शैतान में अन्तर बोध कराता है।
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कितना चले ये महत्त्वपूर्ण नहीं, कहाँ पहुँचे यह महत्त्वपूर्ण है। कितना सुना यह महत्त्वपूर्ण नहीं, कितना आचरण में उतरा यह महत्त्वपूर्ण है।
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आचरणवान कुरूप व्यक्ति सुन्दर व्यक्ति से श्रेष्ठ है।
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तप एवं सदाचार के प्रभाव से निम्नस्तर व्यक्ति भी उच्च स्थान प्राप्त कर लेते हैं।
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आपको बातों के बादशाह नहीं, आचरण के आचार्य बनना चाहिए।
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आज राम की जय जयकार तो सभी करते हैं, लेकिन राम के आचरण को कोई नहीं पालना चाहते हैं।
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सदाचरण ही सुख शान्ति-समृद्धि-सम्पत्ति के बीज बोता है।
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शब्दों में अतिशयोक्ति व न्यूनता हो सकती है, आचरण में नहीं होना चाहिए।
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पवित्रता की राह ही आनंद की राह है।
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जो अपने प्रति वफादार नहीं है, वह दूसरों के प्रति क्या वफादार होगा?
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ईमानदार होना अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी लाभदायक होता है।
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ईमानदार होना इस तरह गर्व करने की बात है जैसे हजारों की भीड़ में से आपको चुन लिया हो।
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बड़प्पन अमीरी में नहीं किन्तु ईमानदारी और सज्जनता में है।
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यदि आप ईमानदार हैं तो चिन्ता न करें, सोना आग में जलकर ही कुंदन बनता है।
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ईमानदारी इज्जत से बड़ी है।
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सच्चा इंसान वही है जो किसी से ईर्ष्या नहीं रखता है।
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कर्त्तव्य शील को सदा प्रसन्नता रहती है, कर्त्तव्य हीन को सदा खिन्नता रहती है।
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प्रत्येक मनुष्य का वास्तविक जीवन-संरक्षक तो उसका कर्त्तव्य ही है।
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आपका कोई क्षण ऐसा न निकले, जो कर्त्तव्य से रिक्त हो।
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अधिकारों का सच्चा स्रोत कर्तव्य है, अगर हम अपने कर्त्तव्य पूरे करें तो अधिकारों को ढूँढ़ने कहीं दूर नहीं जाना पड़ेगा।
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कर्ता मत बनो कर्त्तव्य का पालन करो।
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अपनी कथनी और करनी में अन्तर नहीं होना चाहिए।
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यह संसार कायर पुरुषों के लिए नहीं है, पलायन करने का प्रयास मत करो।
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कायरता से शत्रु के बल की वृद्धि होती है और अपनी शक्ति का ह्रास होता है अतः जहाँ तक बने कायरता को अपने पास न भटकने दो।
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कमजोर आदमी हर काम को असंभव समझता है और वीर हर असंभव कार्य को साधारण समझता है।
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केकड़ों की तरह टाँग खिंचाई मत कीजिए मछली की तरह स्वयं को दूसरों से आगे ले जाइये।
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जिन गलतियों पर हम शर्मिंदा नहीं होते, वे ही आगे चलकर अपराध बन जाती है।
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भूल को छिपाने का नहीं, मिटाने का उपाय करो।
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चढ़ना कठिन होता है किन्तु फिसलना सरल होता है इसीलिए गुण ग्रहण कर उस पर चलना कठिन होता है।
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यदि तुम गुणों का विकास करना चाहते हो तो गुणानुराग का विकास करो, गुणी व्यक्ति को सामने रखो, उसके गुणों के बारे में सोचो, अनुमोदन करो, बाहर का यह कार्य भीतर एक शक्ति पैदा करेगा और तुम गुणी बन जाओगे।
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अपने गुणों से आगे बढ़ना चाहिए, दूसरों की कृपा से नहीं।
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नारकियों में क्रोध, तिर्यंचों में माया, देवों में लोभ और मनुष्यों में मान की अधिकता होती है।
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महत्त्व इसका नहीं है कि हम कब तक जीते हैं, महत्त्व तो इस बात का है कि हम जीते कैसे हैं?
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जीवन में ऐसे जियें कि आपत्ति के समय चेहरे से मुस्कान न जाए और सम्पत्ति के समय चेहरे पर गुमान न आए।
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