Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Character

चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 6 / 15

मनुष्य के जीवन की सफलता इसी में है कि वह उपकारी के उपकार को कभी न भूले, उसके उपकार से भी बढ़कर उसका उपकार कर दे।
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गुण के बिना रूप व्यर्थ, होश न हो तो जोश व्यर्थ, भूख न हो तो भोजन व्यर्थ और सदुपयोग न हो तो धन व्यर्थ ही समझें।
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चालाकी द्वारा कभी कोई बड़ा काम नहीं होता है।
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जो दूसरों की आजादी छीनता है, वही वास्तव में कायर है।
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नैतिक मूल्यों का पतन ही आज की राजनैतिक और सामाजिक अव्यवस्था का मूल कारण है।
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मनुष्य में आधे गुण तो तभी विदा हो जाते हैं, जब वह दासता ग्रहण करता है।
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राजनीति कहती है–हाथ आए दुश्मन को छोड़ना और अपनी हार खरीदना एक ही चीज के दो नाम हैं। यदि जनता की पहुँच नेता तक हो और नेता हित, मित, प्रिय वचन बोलता हो तो वह नेता नेताओं का शिरोमणि बन जाता है।
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न इतने नरम बनो कि निचोड़े जाओ और न इतने सख्त बनो कि तोड़े जाओ।
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व्यक्ति नीति के पथ पर जितना आगे बढ़ेगा आत्मा का उतना ही विकास होगा।
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वही समाज सदैव सुखी रह सकता है जिसने नैतिक गुणों को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया है।
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मानव के सभी गुणों में साहस पहला गुण है क्योंकि वह सभी गुणों की जिम्मेदारी लेता है।
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सुख भाग्यशाली को परखता है और संकट महान् व्यक्ति को।
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सौजन्य वह आवरण है जिससे कई पापों को ढँका जा सकता है।
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सौजन्य से आत्मीयता पैदा होती है।
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स्वाधीन होकर जियो, स्वाभिमान बढ़ेगा।
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स्वाधीन की कुटिया अच्छी किन्तु पराधीनता का स्वर्ग भी अच्छा नहीं है।
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स्वयं को बदलने वाला ही संतोषी तथा सदाचारी हो सकता है।
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अच्छे नेता और नेता बनाने की चेष्टा करते हैं, बुरे नेता अनुयायी बनाने की चेष्टा करते हैं।
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लोक व्यवहार निभाते समय सबके हित का ध्यान रखना मनुष्य जीवन में ऊँचे उठने का यह एक मन्त्र है।
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डरपोक अपनी मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं, बहादुर मौत का स्वाद बस एक बार चखते हैं।
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हमारी वाणी, विचार और व्यवहार पर हमारे जीवन की सफलता निर्भर करती है।
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अगर हम समाधान का हिस्सा नहीं है तो हम समस्या है।
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यदि तुम्हें स्वाधीनता पसंद है तो दूसरों को भी अपने आधीन मत रखो।
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जिन्दगी में जब मुसीबत आए, तो हो सके तो किसी से मदद मत माँगना क्योंकि मुसीबत चार दिन की और एहसान जिन्दगी भर का हो जाता है।
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जिसकी नीति अच्छी होगी उसकी 'उन्नति' हमेशा होगी।
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एक सच्चा नेता लोगों के विचारों के पीछे नहीं चलता बल्कि वह लोगों के विचारों को बदल देता है।
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परधन, परस्त्री त्रिजगत् निन्द्य हैं।
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वीर का परिचय वीरता से, ज्ञानी का परिचय वाणी से, साधु का साधना से परिचय होता है।
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अपनी प्रशंसा, पर की निंदा, महापुरुषों से ईर्ष्या और असम्बद्ध अप्रासंगिक एवं बहुत बोलना, ये कार्य अपने आपको नीचे गिरा देते हैं।
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व्यक्ति को परखने की कसौटी उसके आचार-विचार हैं।
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सम्मान से जीने का महान् तरीका है कि हम वो बनें जो हम होने का दिखावा करते हैं।
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सुन्दरता की तलाश में चाहे आप सारी दुनिया का चक्कर लगा आयें लेकिन सुन्दरता अगर आपके अन्दर नहीं तो कहीं नहीं मिलेगी।
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इंसानी स्वभाव–एक बार सहायता न करने पर पहले की गयी सहायताओं को भूल जाता है या पहले के उपकारों को नहीं मानता है।
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कारण रहित मित्रता, अहंकार रहित स्वामित्व, लोकापवाद रहित सतीत्व, सबको प्रिय उचित कथन शीलता, वैभव युक्त विद्वत्ता, चंचलता रहित यौवन तथा अंत तक कलंक रहित राजत्व संसार में दुर्लभ हैं।
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संसार में सुदृढ़भूषण क्या है? यश न कि रत्न। कर्त्तव्य क्या है? सज्जनों की भाँति पुण्याचरण न कि दुष्कर्म। अप्रतिहत चक्षु क्या है? बुद्धि न कि नेत्र।
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वही मनुष्य नेता बनने योग्य होता है, जो अपने सहायकों की मूर्खता की, अपने अनुगामियों के विश्वास घात की, मानव जाति की कृतघ्नता की और जनता की गुण-ग्रहण हीनता की, कभी शिकायत नहीं करता है।
चरित्र
यदि मनुष्य के पास क्षमा है तो कवच की क्या आवश्यकता? यदि क्रोध है तो शत्रुओं की क्या आवश्यकता? यदि मित्र हैं तो दिव्य औषधियों की क्या आवश्यकता? यदि दुर्जन है तो सर्पों की क्या आवश्यकता? यदि निर्दोष विद्या है तो धन की क्या आवश्यकता? यदि लज्जा है तो आभूषण की क्या आवश्यकता? यदि काव्य शक्ति है तो राज्य की क्या आवश्यकता? यदि लोभ है तो और अवगुणों की क्या आवश्यकता? यदि चुगलखोरी है तो अन्य पापों की क्या आवश्यकता? यदि सत्य है तो तपस्या की क्या आवश्यकता? यदि मन शुद्ध हैं तो तीर्थों की क्या आवश्यकता? यदि सज्जनता है तो और गुणों की क्या आवश्यकता? यदि यश है तो आभूषणों की क्या आवश्यकता? यदि अपयश है तो मृत्यु की क्या आवश्यकता? यदि दया है तो रिश्तेदार की क्या आवश्यकता? यदि संतोष है तो स्वर्ग की क्या आवश्यकता? दुःख है तो नरक की क्या आवश्यकता?
चरित्र
धैर्य, मनोनिग्रह, इन्द्रियसंयम, पवित्रता, दया, कोमलवाणी और क्रोध एवं मित्र से द्रोह न करना; ये सात बातें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली हैं।
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बड़प्पन अमीरी में नहीं ईमानदारी और सज्जनता में रहता है।
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चरित्र हीन धनी भी विपत्ति में पड़ता है।
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जिस व्यक्ति में अभय, मृदुता, सत्य, सरलता, करुणा, धैर्य, अनासक्ति, स्वावलम्बन, स्वशासन, सहिष्णुता, कर्तव्यनिष्ठा, व्यक्तिगत संग्रह का संयम और प्रामाणिकता होती है, वह नीतिमान कहलाता है।
चरित्र
आचार से बढ़कर और कोई प्रचार हो ही नहीं सकता, जो काम मनुष्य दूसरे से कराना चाहता है, उसे वह स्वयं करे, उसका यह सबसे बढ़कर प्रचार होगा।
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राजनीति के पीछे नीति से भी हाथ न धो बैठो क्योंकि नीति का विश्व मानव के साथ व्यापक सम्बन्ध है।
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उदार रहो, कृपा करो, सबके साथ समानता निभाओ, पर सस्ते न बनो, अपना भेद न दो जिससे कि दूसरे लोग अनुचित लाभ उठाने लगे।
चरित्र
जो सभी का शुभ चाहता है, किसी के अशुभ की कामना नहीं करता सत्यवादी है, कोमल है, जितेन्द्रिय है वही उत्तम पुरुष है।
चरित्र
संकट ही चरित्र को निखार कर नैतिक बल प्रदान करते हैं।
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ईर्ष्या नहीं करना, क्षमा, शान्ति, सन्तोष, प्रियवाणी होना तथा काम क्रोध का त्याग ये श्रेष्ठ आचरण के लक्षण हैं।
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स्वाधीनता सद्गुणों को जगाती है, पराधीनता दुर्गुणों को जगाती है।
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लज्जा से रहित व्यक्ति ही स्वार्थ के साधक होते हैं।
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थोड़े भी उपकार को मानना सज्जनता है नहीं मानना दुर्जनता है।
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उत्तम विचार और महान् चरित्रबल ही परम धन है।
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आत्म विश्वास, दृढ़ता तथा वैराग्य ये तीन बातें जो अपने में धारण करता है, वही समस्त श्रेष्ठ गुणों का आश्रय लेने से सम्पूर्ण प्रजा का नेता होता है।
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जब नेता उन कर्त्तव्यों को छोड़ देते हैं जो उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए निर्दिष्ट किए हैं तब सबसे अधिक शक्तिशाली संघटन भी विघटित हो जाते हैं।
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विद्वान्, शूरवीर, धनी, धर्म निष्ठ, स्वामी, तपस्वी, सत्यवादी तथा बुद्धिमान मनुष्य ही प्रजा की रक्षा करते हैं।
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बुराई से हारो नहीं भलाई से बुराई को जीत लो।
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भोजन मसाले से मनुष्य गुणों से अच्छा लगता है।
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मनुष्य उसी को कहना जो कि मननशील होकर अपने समान अन्यों के सुख-दुःख और हानि लाभ को समझे, अन्यायकारी बलवान से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल हो तो भी डरता रहे।
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अपकीर्ति माननीय पुरुष के लिए मरण से भी अधिक बुरी होती है।
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यश की प्राप्ति भले ही न हो किन्तु अपयश होना उचित नहीं है।
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सदाचारी, श्रद्धावान और ईर्ष्या रहित मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है चाहे वह सब प्रकार के शुभ लक्षणों से हीन ही क्यों न हो?
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बहुत लोगों की अपेक्षा थोड़े से ईमानदार लोग अधिक अच्छे हैं।
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तुम किसी से उपहार मत लो क्योंकि उपहार विद्वान् को अंधा कर देता है और सदाचारी के शब्दों को भी दूषित कर देता है।
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एक मात्र अमोघ नियम–जो मनुष्य सदैव सज्जन होने की बात करता रहता है, वह कभी भी सज्जन नहीं होता है।
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लज्जाशील पुरुष को कलंक लगने पर उसके गुण भी सुख नहीं दे पाते हैं।
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संसार में रम्यता तो सुलभ है किन्तु गुणों की प्राप्ति दुर्लभ है।
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गुणियों के गुण ही पूजा के स्थान होते हैं, लिंग अथवा उम्र नहीं।
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जिस गुण से मनुष्य की जीविका चलती हो और प्रशंसा होती हो, गुणी को चाहिए कि उस गुण की रक्षा करे और उसे बढ़ाये।
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जो शत्रुओं को भी प्रसन्न कर दें, वही गुणों की असाधारणता होती है।
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सद्गुण रूप अमृत का आस्वाद लेने में प्रायः सत्पुरुष ही कुशल होते हैं, गुणों से सम्पन्न पुरुष में थोड़े भी गुण अधिक हो जाते हैं।
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किसी गुणवान मनुष्य में कोई दोष भी देखकर गुणानुरागी व्यक्ति खिन्न नहीं होते क्योंकि चन्द्रमा में पड़े कलंक को भी लोग प्रेम से ही देखते हैं।
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गुणहीन धनिकों से गुणी दरिद्र श्रेष्ठ होता है।
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मनुष्यों को गुणों की प्राप्ति में प्रयत्नशील होना चाहिए क्योंकि गुणी व्यक्तियों के लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है, गुणों की अधिकता से ही चन्द्रमा शिव जी के मस्तक पर विराजमान है, जहाँ दूसरे लोग पहुँच भी नहीं सकते हैं।
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जो कुछ आँखों से नहीं दिखता उसे चरित्र द्वारा देखना पड़ता है।
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मनुष्य के बाहर का रूप देखकर उसके चरित्र के बारे में निर्णय कर लेना अनुचित है।
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स्वार्थी व्यक्ति सबसे अधिक ठगा हुआ है।
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