Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Character

चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 5 / 15

किसी कार्य के लिए कला एवं विज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, उसमें धैर्य की भी आवश्यकता है।
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शक्ति भय के अभाव में रहती है, न कि मांस या पुट्ठों के गुणों में जो कि हमारे शरीर में होते हैं।
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परिस्थितियाँ ही मनुष्य में साहस का संचार करती हैं।
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भरी नदी की भाँति व्यवहार, वचन और भावों में गंभीरता होना चाहिए चाहें, बिजली कितनी ही तड़के पर आकाश में खलबली नहीं मचती है, विविध लहरों में भी निश्चलता यही समुद्र का सच्चा गांभीर्य है।
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भय से मनुष्य को तब तक डरना चाहिए जब तक भय नहीं आया है, परन्तु जब आ ही जाए तो निडर होकर उस पर प्रहार करना चाहिए।
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जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही व्यक्ति बुरे किस्म का निंदक भी होता है।
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छोटी-छोटी बातों से ही हमारे सिद्धान्तों की परीक्षा होती है
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गम्भीरता सज्जनों का पहला गुण होता है।
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दूरदर्शिता, साहस और गंभीरता के बिना जिंदगी एक अंधा तजुर्बा है।
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सच्चा बड़प्पन स्थान से कभी नहीं मिलता और न वह उपाधियों के वापस ले लेने पर कभी खो ही जाता है।
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युवकों में जोश और प्रौढ़ों में होश की प्रधानता होती है।
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गम्भीरता में जो प्रतिष्ठा निहित है वह वाचालता में त्रिकाली संभव नहीं है। ''एक क्षण का असंयम अनंत संसार का कारण है।''
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जैसे उत्साह स्त्रियों का गुण है, उसी तरह गंभीरता पुरुषों का गुण है।
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बड़प्पन अमीरी में नहीं किन्तु ईमानदारी और सज्जनता में है।
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मैं महान् उनको मानता हूँ, जो स्वयं अपना मार्ग बनाते हैं परन्तु कभी मिथ्या मार्ग पर चल पड़े तो लौट आने का साहस और बुद्धि भी रखते हैं।
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आपके बल प्रयोग की अपेक्षा आपकी सज्जनता हमें सज्जनता की ओर चलने के लिए अधिक प्रेरित करती है।
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सच्चा साधक लोभ और भय के आगे झुक नहीं सकता है।
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जिस प्रकार मलिन घी का घड़ा बिना जल के ही शुद्ध होता है उसी प्रकार ज्ञान-चारित्र से मुनिराज को निर्मल जानना चाहिए।
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गुस्सा अक्ल को खा जाता है, अहंकार मन को खा जाता है, चिन्ता आयु को खा जाती है, रिश्वत इंसान को खा जाती है, लालच ईमान को खा जाता है और झूठ सभी गुणों को खा जाता है।
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सबको हँसाना पर किसी पर हंसना मत, सबके दुःख बाँटना पर किसी को दुःखी करना मत, सबकी राह में दीपक जलाना पर किसी से जलना मत।
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मुस्कुराते हुए चेहरे से किया गया स्वागत और जलपान पूरे भोजन के बराबर होता है।
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मुस्कुराहट वो हीरा है जिसे आप बिना खरीदे पहन सकते हैं और जब तक हीरा आपके पास है आपको सुन्दर दिखने के लिए किसी और चीज की आवश्यकता नहीं है।
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जरा सी मुस्कान से फोटो अच्छी आ सकती है तो फिर हमेशा मुस्कुराने से जिन्दगी अच्छी क्यों नहीं बन सकती है?
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किसी भी व्यक्ति को इतना निर्धन नहीं होना चाहिए कि वह दूसरों को मुस्कान रूपी उपहार भी न दे सके।
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जीवन पथ पर फूल नहीं बिखेर सकते तो कम से कम मुस्कान तो बिखेर सकते हो।
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दूसरों को हँसाने की कला सीखिए।
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होंठों से तो सभी मुस्कुराते हैं, आप आँखों से मुस्करायें तो मुस्कान चौगुनी असरदार होगी।
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हँसना अच्छा है किन्तु हँसने से पूर्व हमें यह अवश्य जान लेना चाहिए कि हमारी हँसी कहीं किसी के रुदन का कारण तो नहीं है।
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जो खुद पर हँसना नहीं जानता, उस पर लोग हँसते हैं।
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दूसरों की हार पर हँसने वाला, एक दिन खुद अपनी हार पर आँसू बहाता है।
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अगर आपको किसी की हँसी निर्मल लगती है तो जान लीजिए वह आदमी भी निश्छल है।
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जिसके पास पैसा नहीं वह दरिद्री नहीं अपितु जो दूसरों को देखकर प्रसन्न नहीं होता, दूसरों की प्रशंसा नहीं करता वह दरिद्री हैं।
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हँसता हुआ चेहरा आपकी शान बढ़ाता है मगर हँसकर किया हुआ कार्य आपकी पहचान बढ़ाता है।
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मानव के अंदर जो कुछ सर्वोत्तम है, उसका विकास प्रशंसा तथा प्रोत्साहन के द्वारा किया जा सकता है।
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सज्जन कभी उपकार भूलते नहीं और दुर्जन कभी उपकार मानते नहीं।
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जब तक दूसरों का कर्ज चुका नहीं दिया जाता तब तक हम सदाचारी कभी नहीं कहला सकते हैं और हमें स्वर्ग में प्रवेश भी नहीं मिल सकता है।
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भावना से कर्त्तव्य ऊँचा होता है।
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कृतज्ञता एक कर्तव्य है जिसे लौटाना चाहिए।
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दया और कृतज्ञता उदारता के सहायक हैं।
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उत्तरदायित्व से महान् बल प्राप्त होता है, जहाँ कहीं उत्तरदायित्व होता है वहीं विकास होता है।
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जिन्होंने आपको संकट काल में सहारा दिया उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहो।
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संसार में दो व्यक्ति दुर्लभ हैं, उपकारी और कृतज्ञ।
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कृतघ्न शिष्य गुरु का उपकार नहीं मानते और संसार वृद्धि करते हैं।
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आप प्रतिदिन कृतज्ञता की प्रवृति को विकसित करें।
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कृतज्ञता की सीमा किए हुए उपकार पर अवलम्बित नहीं है उसका मूल्य उपकृत व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर है।
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अन्य सब दोषों से कलंकित मनुष्यों का उद्धार हो सकता है किन्तु अभागे किए हुए उपकार को नहीं मानने वाले का कभी उद्धार नहीं होगा।
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मनुष्य के आचरण से उसके कुल का अनुमान लगता है, उसकी भाषा से उसके मूल देश का परिचय मिलता है और उसके द्वारा किए गए आदर-सत्कार से उसके हृदय की उदारता या कृपणता का अनुमान लग सकता है।
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अधम मनुष्य धन चाहते हैं, मध्यम वर्ग के लोग धन और मान दोनों चाहते हैं किन्तु उत्तम वर्ग के लोग केवल मान चाहते हैं क्योंकि मान ही सब धन से बड़ा है।
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सम्मान ही सद्गुणों का प्रेरणास्पद पुरस्कार है।
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बुढ़ापा रूप (सुन्दरता) को, आशा धीरता को, मृत्यु प्राणों को, दोष देखने की आदत धर्माचरण को, क्रोध लक्ष्मी को, नीच पुरुषों की सेवा सत्स्वभाव को, काम लज्जा को और अभिमान सर्वस्व को नष्ट कर देता है।
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सत्ता जिसके हाथ में आती है वही मदांध होकर बेईमान, दुश्चरित्र और बदनीयत हो जाता है।
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एक बार सत्ता मिलने पर उसे किसी मूल्य पर बनाये रखने की आकांक्षा सत्ताधारियों में उत्पन्न हो जाती है।
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जुआ मत खेलो, भले ही उसमें जीत क्यों न होती हो; क्योंकि तुम्हारी जीत उस काँटे के मांस के समान है, जिसे मछली निगल जाती है।
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मनुष्य को जितना अधम जुआ बनाता है उतना और कोई नहीं क्योंकि इससे उसकी कीर्ति, विद्वत्ता और सम्पत्ति; ये सब उसका साथ छोड़ देते हैं, उसका हृदय कुकर्म करने की प्रेरणा पाता है यहाँ तक कि खाने और कपड़े तक के लिए भीख माँगनी पड़ती है।
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धन-धान्य के प्रयोग में, विद्या के ग्रहण करने में, आहार और व्यवहार में जो लज्जा का त्याग कर देता है वह सुखी होता है।
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मूढ़ आदमी यदि अपने नंगे बदन को ढँकता है, तो इससे क्या लाभ जबकि उसके मन के अवगुण ढँके ही नहीं हैं।
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आप यदि अपनी उन्नति चाहते हो तो कभी चार के कच्चे नहीं होना श्रद्धा, कर्त्तव्य, विचार और कान।
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आपका पहला गुण सत्यवादी, दूसरा समझदारी, तीसरा खुशमिजाजी और चौथा हाजिर जवाबी हो।
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जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रु के साथ बुद्धिपूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसन्द नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है वही वीर है।
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जो क्रोध या उतावली के साथ धर्म, अर्थ तथा काम का आरंभ नहीं करता, पूछने पर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रों के साथ झगड़ा नहीं करता, आदर न पाने पर क्रुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खोता, दूसरों के दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, बढ़ चढ़कर नहीं बोलता, विवाद नहीं करता तथा दुःखों को समता से सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है।
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मीठे वचन से-मित्रता, विनय से-पात्रता, दान से-यश, अभ्यास से-विद्या, उदारता से-प्रभुता, सदाचार से विश्वास, शृंगार से-अनुराग, उद्यम से-लक्ष्मी, न्याय से-राज्य, क्षमा से-तप और लोभ से पाप बढ़ता है।
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कीचड़ से कंचन उठा लेना सज्जनों की नीति है।
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'नेता' मंच, माला, माइक और नोट-वोट-सपोर्ट चाहते हैं परन्तु नैतिकता सेवा चाहती है।
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दूसरों को गिराकर आगे बढ़ने वाले को आखिर एक दिन गिरना ही पड़ता है।
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प्रेम सबसे कीजिए विश्वास कुछ पर और बुरा किसी का भी मत कीजिए।
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किसी का चहेता बनने के लिए उसके नाम को न भूलें।
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सभी के लिए अपना नाम सबसे महत्त्वपूर्ण और मधुरतम शब्द होता है।
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हर साधु उपदेशक हो सकता है, पर हर उपदेशक साधु नहीं हो सकता।
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बहुत अधिकार मिल जाने पर मनुष्य का विचार दूषित हो जाता है।
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आँखों से गिरा आँसू और नजरों से गिरा इंसान कभी नहीं उठ सकता है।
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अनुशासन हीनता और आचरण हीनता ही देश की गरीबी का सबसे बड़ा कारण है।
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जैसे व्यवहार की तुम दूसरों से अपेक्षा रखते हो वैसा ही व्यवहार तुम दूसरों के प्रति भी करो। यदि अपनी दुर्दशा से बचना हो तो दुराचरण मत करो।
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बुरी आदतों से क्षुद्रता का आभास होता है।
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इज्जत जब चली जाती है तो लाखों प्रशंसाओं से भी वापस नहीं आती है।
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प्रेम कहता है आगे बढ़ो और प्रतिस्पर्धा कहती है कि मेरे पीछे रहो।
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