छःद्रव्य, सात तत्त्व, पाँच अस्तिकाय, नौ पदार्थ, बन्ध-मोक्ष और मोक्ष के कारण रूप बारह अनुप्रेक्षाओं में, रत्नत्रय, शुभकर्म, दया आदि सद्धर्म इत्यादि में जो प्रवृत्ति करता है वह शुभ भाव है। धर्म 0 – भेजें
नव देवताओं के प्रति प्रशस्त राग हो व जीवों के प्रति दया हो और तीव्र क्रोध-मान-माया-लोभ का अभाव होने से 'पुण्य का आस्रव' होता है। धर्म 0 – भेजें
अनन्त चतुष्टय का घात पुण्य से नहीं, पाप से होता है, इसीलिए पुण्य को बढ़ाना चाहिए और पाप को घटाना चाहिए। कर्म 0 – भेजें
'वन में' राम के लिए यक्ष के द्वारा रामपुरी की रचना। 'रण में' खरदूषण से युद्ध मे विराधित विद्याधर के द्वारा लक्ष्मण का सहयोग। 'शत्रु विद्याधर रावण से' भूमिगोचरी राम की विजय। 'जल में' पोटली बनाकर फेंक दिए जाने पर देवों द्वारा यमपाल चाण्डाल के लिए सिंहासन की रचना। 'अग्नि के मध्य में' सीता के अग्नि कुण्ड को देवों द्वारा जल कुण्ड मे परिवर्तित करना। 'समुद्र में' श्रीपाल जी को धवल सेठ द्वारा गिरा दिए जाने पर भी रक्षा होना। 'वंशस्थ पर्वत पर' श्री कुलभूषण-देशभूषण जी का श्री राम-लक्ष्मण जी के द्वारा उपसर्ग निवारण। 'सुप्त अवस्था में' सर्प से नेवले द्वारा बालक की रक्षा। 'प्रमत्त अवस्था में' पूर्व के उपकृत जटायु एवं कृतान्तवक्त्र के जीव देवों द्वारा श्री राम का सहयोग। 'विषम स्थिति में' पाण्डवों की लाखा महल से रक्षा एवं प्रतिसूर्य विद्याधर ने अञ्जना को वन में बहन बनाकर सहायता की और हनुरुह द्वीप ले गया। इन सभी स्थितियों में पूर्वकृत पुण्य ने रक्षा की। कर्म 0 – भेजें
जिसके पुण्य और पाप दोनों की निर्जरा होती है पुन: आस्रव नहीं होता है उस योगी को निर्वाण प्राप्त होता है एवं वहाँ से पुन: संसार में आगमन नहीं होता है, इसके पहले पुण्य की नहीं पाप की निर्जरा होती है। धर्म 0 – भेजें