साढ़ूमल में पण्डित हीरालालजी शास्त्री रोज प्रवचन करते थे, एक व्यक्ति रोज प्रवचन सुनता था, पर गरीब था, अत: अपने घर से पाँचवे घर में चोरी करने गया, पर पाप के डर से, इसमें कम पाप लगेगा ऐसा मानकर एक बोरा भूसा की चोरी की, बोरा फटा था, तो भूसा वहाँ से घर तक गिरता रहा ध्यान नही दिया, लाइन बन गयी, सुबह लोगों ने देखा तो वह पकड़ा गया, पञ्चायत हुयी, पूछा तुमने चोरी की है, उसने कहा! हाँ की है, क्यों की है? तब कहा! हम तीन दिन से पानी में आटा घोलकर पीकर दिन निकाल रहे हैं, हमारा बेटा तीन दिन से दूध मांग रहा है उसको कब तक दूध के स्थान पर पानी में आटा घोलकर पिलाते रहेंगे? हमने सोचा एक बोरा भूसा चार आना में बिकेगा, तीन-चार दिन दूध आयेगा, फिर आगे देखेंगे, क्योंकि पण्डित जी रोज प्रवचन में कहते हैं ज्यादा आसक्ति नहीं रखना चाहिये, प्रवचन सुनने का यह परिणाम था। अनासक्ति 0 – भेजें
एक महिला सिनेमा के पर्दे पर आन्धी-तूफान-वर्षा देख कर सोचने लगी, मेरे छत पर कपड़े सूख रहे हैं वे उड़ जायेंगे और भींग जायेंगे, उन्हे चलकर उठा लूँ, वह सिनेमा घर से उठकर शीघ्रता से घर की ओर चल पड़ी, शीघ्रता के कारण एक मोटर से टकराई और मरगई, उसी प्रकार संसारी प्राणी नकली को असली समझ कर भ्रम बुद्धि से दु:खी होते हैं। विवेक 0 – भेजें
एक सज्जन अत्यन्त गरीब थे, एक दिन बाजार से गुजर रहे थे, कोई व्यक्ति अत्यन्त उपयोगी दो पुस्तकें बेच रहा था, उसके पास पैसे नहीं थे, उधार देने को वह तैयार नहीं हुआ, अत: अपना कुर्ता गिरबी रख कर वे पुस्तकें खरीद लाये, चार छह दिन बाद जब पैसे आये तब कुर्ता बापस ले आये, क्या हम में ऐसी ज्ञान की ललक है? उन्होंने कुर्ता को नहीं, ज्ञान को कीमती समझा, हम धन रखने के लिए तिजोरियाँ खरीदते हैं, कार के लिये गैरिज बनवाते हैं, ड्राइवर रखते हैं, क्या कभी तत्त्व ज्ञान की पुस्तकें खरीदतें हैं व शास्त्रों के लिए अलमारी खरीदते हैं? ज्ञान 0 – भेजें