जिनेन्द्र वर्णी- व्यक्तित्व कर्तृत्व-जिनेन्द्र वर्णी जी का जन्म पानीपत हरियाणा में हुआ था। पिता का नाम भगवानदास एडवोकेट था। इनकी शिक्षा पिताजी से हुयी थी। स्वयं इञ्जीनियर थे, पहले आचार्य विमलसागरजी से क्षुल्लक दीक्षा हुयी थी। पिता विद्वान् थे, गणेशप्रसाद वर्णीजी भी पानीपत में विराजमान थे, वहाँ पर आर्यसमाज से संस्कृत में शास्त्रार्थ हुआ। जैनी संस्कृत नहीं जानते नहीं थे, तब वर्णी जी ने एक बच्चे को द्रव्य सङ्ग्रह रटा दिया था। जब शास्त्रार्थ हुआ तो सबसे पहले बच्चे को खड़ा कर दिया, आर्य समाज प्राकृत नहीं जानती थी। वे उसका उत्तर नहीं दे सके, भगवानदास जी सभा में खड़े हो गये कि तुम हार गये एवं वर्णीजी ने समर्थन कर दिया, सभा के लोगों ने नारे लगा दिये, जैन समाज की जीत हो गयी थी। ज्ञान 0 – भेजें
शरीर और कषाय का कृश करना सल्लेखना है, जिनेन्द्र वर्णीजी का एक फेफड़ा था, डॉक्टर ने दूसरी बार पानी लेने को कहा, तब सारे समाचार पत्रों में निकलवाया एवं व्रत खेद पूर्वक छोड़े, बाम्बे हास्पिटल में डॉक्टर ने कहा आपको सूप लेना पड़ेगा, वर्णी जी से पिताजी ने कहा डॉक्टर ऐसा कह रहा है, वर्णीजी डॉक्टर के पास स्वयं गये और कहा कि क्या आप दावा कर सकते हैं कि मैं सूप लेकर जिन्दा रह सकता हूँ? किन्तु मैं दावा करता हूँ कि मैं शाकाहार से जिन्दा रह सकता हूँ। एवं वर्णी जी ने जैनेन्द्र सिद्धान्त कोष की रचना कर जैन संस्कृति को अद्भुत धरोहर समर्पित की है। आचार्य श्री विद्यासागर जी से बाद में पुनः व्रत ग्रहण कर सल्लेखना शुरू की, क्षमासागर जी समयसार सुनाते थे, पन्द्रह गाथा सुनाने के बाद पूँछा और सुनाऊँ? तो हाथ जोड़ कर बोले इतना उतर जाये तो पर्याप्त है, आचार्य श्री ने कहा वो महान साधक थे वर्णीजी की सन् 1983 ईसरी में सल्लेखना पूर्ण हुयी थी। समाधि 0 – भेजें
नैनागिर जी में सब साधुओं की चरणछूकर वन्दना करते थे तो सब साधुओं ने कहा वहीं से कर लिया करो, वर्णीजी ने कहा अविनय होती है। विनम्रता 0 – भेजें