श्रावक श्रमण का सङ्घ वर्षा योग जिसमें ऊपर से बादल बरसते हैं, नीचे साधु देशना की वर्षा करते हैं, जिससे कई गुणी शीतलता हो जाती है। धर्म 0 – भेजें
ठण्डी गर्मी में धनार्जन, वर्षा में धर्मार्जन, वर्षा में गली भवन धुलते हैं, वर्षा योग में दिल दिमाग धुलते हैं। धर्म 0 – भेजें
चार माह की उपयोगिता- अषाढ़ में धर्म की बाढ़, सावन में पावन, भाद्रपद में भद्रता हो जाती है, इससे जो वञ्चित है वह कुवाँर में कोरा, कार्तिक में कायर, होकर पलायन कर जाता है, चार माह कायर होने के नहीं वीर होने के हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
गाय सफेद हो या लाल दूध सफेद ही देती है, साधु द्रव्य लिङ्गी हो या भावलिङ्गी श्रद्धा करोगे तो तिर जाओगे। भक्ति 0 – भेजें
शास्त्र पढ़ो, झुकना सीखो, श्रद्धा करो, आचरण में उतारो, आत्म कल्याण करो, पशुमय जिन्दगी से बाहर आकर प्रभुमय जिन्दगी व्यतीत करो। धर्म 0 – भेजें
बसन्त आने पर प्रकृति मुस्कुराती है और सन्त के आने पर संस्कृति मुस्कुराती है, सूखों को हरा करना बसन्त का काम है, मुर्दों (आलसी) को खड़ा करना सन्त का काम है। संगति 0 – भेजें
वर्षा योग की स्थापना प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी के दिन होती है यदि किसी कारण वश चातुर्मास स्थल पर नहीं पहुँच पाये तो पाँच दिन बाद तक वर्षायोग की स्थापना होती है अर्थात् श्रावण कृष्णा चतुर्थी तक हो सकती है। धर्म 0 – भेजें
वर्षायोग की स्थापना के दिन उपवास होता है, भक्तियों का पाठ होता है। विशेष साधना का संकल्प होता है। चातुर्मासिक प्रतिक्रमण होता है। धर्म 0 – भेजें
वर्षायोग निष्ठापन कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन होता है। इसके पूर्व चतुर्दशी को उपवास होता है, कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रातःकाल वर्षायोग निष्ठापन की भक्तियाँ होती है और वीर निर्वाण महोत्सव की भी भक्तियाँ होती है। धर्म 0 – भेजें