एक समय में जो समय प्रबद्ध बँधता है, उसकी इतनी स्थिति पड़ सकती है कि असंख्यात भवों में भोगना पड़ सकता है, जैसे हाटबाजार के दिन कमाता है, कई दिन बैठ के खाता है, अनेक भवों में कर्म सञ्चित करता है और तपस्या से एक क्षण में नष्ट कर देता है, जैसे वर्षों में धन कमाता है और लड़की की शादी में सब चला जाता है या बीमारी में चला जाता है। कर्म 0 – भेजें
ततश्चनिर्जरा-कर्म आता है तो पता नहीं चलता, जब जाता है तो कष्ट होता है, तीर्थंकर भी उसके फल से नहीं छूटते हैं। कर्म 0 – भेजें
सुख पूर्वक प्राप्त किया गया ज्ञान, दुःख आने पर नष्ट हो जाता है, इसलिए मुनि दुःख पूर्वक आत्मा की भावना करें। ध्यान 0 – भेजें
ध्यान करने वाले का लक्षण- जिनेन्द्र आज्ञा का श्रद्धानी हो, साधु के गुणों का प्रशंसक हो, दान, श्रुत, शील, तप, संयमी, प्रसन्नचित्त, प्रेमी, शुभोपयोगी, शास्त्राभ्यासी, स्थिरचित्त, वैरागी, निरोगी, निर्विषयी, दयालु, शुभगन्ध, अल्प मल-मूत्र वाला होना चाहिए। ध्यान 0 – भेजें
ध्यानमेवप्राणाः मुनीश्वराणां- मुनीश्वरों के प्राण ध्यान ही हैं, ध्यान का प्रयोजन परम वैराग्य भाव है। ध्यान 0 – भेजें
मनोगुप्ति- राग-द्वेष, मोह के त्याग रूप अथवा आगम का विनय पूर्वक अभ्यास और धर्म्य-शुक्लध्यानरूप मनोगुप्ति है, तत्त्वों को जानने वाले के मन का रागादि के साथ नहीं होना मनोगुप्ति है, कालुष्य, मोह, आहारादि संज्ञायें राग-द्वेष आदि अशुभ भावों का परिहार मनोगुप्ति है। संयम 0 – भेजें