Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 371

दशकरण दृष्टान्त। गुणस्थानों के उदाहरण।

6 सूत्र

हाथी की नाक प्रमाण निर्माण से अधिक है।
विविध
स्तवुक सङ्क्रमण- विरोधी राजा ने चढ़ाई की और कहा कोई पुरूष नहीं निकल सकता लेकिन स्त्रियाँ निकल सकती हैं, राजा ने स्त्री का वेश धारण किया और नगर के बाहर चला गया, इसी प्रकार जो प्रकृतियाँ अन्य प्रकृति रूप परिणमन करके उदय में आती हैं उसे स्तवुक सङ्क्रमण कहते हैं।
कर्म
एक समय में होने वाले कार्य को फाली कहते हैं, अन्तर्मुहूर्त में होने वाले कार्य को काण्डक कहते हैं।
कर्म
दशकरण दृष्टान्त- 1.बन्ध- रविवार को भोजन का निमन्त्रण है उसे स्वीकार करना बन्ध है। 2.सत्ता- सोमवार से रविवार के बीच का समय सत्ता है। 3.उदय- रविवार को ठीक समय भोजनार्थ आना उदय है। 4.उपशम- भोजन में देर होने से थोड़ी देर प्रतीक्षा करना उपशम है। 5.उदीरणा- 10 बजे के स्थान में 9:30 पर आना उदीरणा है। 6.अपकर्षण- रविवार के स्थान पर शुक्रवार को आना अपकर्षण है। 7.उत्कर्षण- रविवार को न आकर मङ्गलवार को आना उत्कर्षण है। 8.सङ्क्रमण- जिसको निमन्त्रण दिया उसके बदले में किसी दूसरे को भेजना सङ्क्रमण है। 9.निधत्ति- ठीक उसी दिन 10 बजे भोजन में स्वयं आना निधत्ति है। 10.निकाचित- रविवार को स्वयं समय पर घर आना, न अगले दिन न पिछले दिन निकाचित है। 11.उदयाभावी क्षय- भोजन को आना किन्तु अस्वस्थ होने से भोजन नहीं करना उदयाभावी क्षय है। 12.देशघाती- फलाहार लिया, भोजन नहीं किया देशघाती है। 13.सर्वघाती- भरपेट भोजन करना सर्वघाती है। 14.क्षय- भोजन से पहले स्वर्गवास हो जाना क्षय है।
कर्म
दशकरण के अन्य दृष्टान्त- 1.बन्ध- 50 थान कपड़ा गोदाम में रखा है। 2.उदय- कुछ माल बिक गया है। 3.सत्ता- जितना रखा वह सत्ता है। 4.उपशम- भाव गिरने से बेचना बन्द करना। 5.उदीरणा- समय से पहले दुकान खोलना। 6.सङ्क्रमण- उसके स्थान पर दूसरा माल बेंचना। 7.अपकर्षण- भाव बढ़ने से, समय से पहले ही बेंचना। 8.उत्कर्षण- भाव घटने से कुछ दिन बाद बेंचना। 9.निधत्ति- उसी समय उसी भाव से माल बेंचना। 10.निकाचित- समय पर वही माल बेंचना, न आगे, न पीछे।
कर्म
गुणस्थानों के उदाहरण- 1.मिथ्यात्व गुणस्थान- ज्वर पीड़ित रोगी को मधुर रस भी कटु लगता है, उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि को धर्म नहीं रुचता है। 2.सासादन गुणस्थान- पर्वत के शिखर से गिरना भूमि के सम्मुख होना। 3.मिश्र गुणस्थान- दही-गुड़ के समान मिश्रित स्वभाव होना। 4.सम्यक्त्व गुणस्थान- फिटकरी युक्त स्वच्छ जल उपशम, पूर्ण स्वच्छजल क्षायिक, कुछ मलिन जल क्षयोपशम। 5.देशविरत गुणस्थान- सङ्कल्पी त्रसहिंसा से विरत तथा आरम्भी-उद्योगी-विरोधी एवं स्थावर की हिंसा से अविरत। 6.प्रमत्तविरत गुणस्थान- व्यक्ताव्यक्त प्रमाद, चितकबरे मृगवत्। 7.अप्रमत्तविरत गुणस्थान- अधःकरण, मोटी धार वाला आरा, यहाँ स्थिति बन्धापसरण (पाप प्रकृतियों की स्थिति का घटना) होता है। 8.अपूर्वकरण गुणस्थान- अपूर्वकरण परिणाम, पैनी धार वाला आरा, स्थिति काण्डक घात (पाप प्रकृतियों की स्थिति का तेजी से घटना) होता है। 9.अनिवृत्तिकरण गुणस्थान- तेज धार वाला छोटा आरा, कम समय में अधिक कार्य होता है। 10.सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान- हल्दी से रङ्गे हल्के रङ्गीन वस्त्र के समान सूक्ष्म कषाय होती है। 11.उपशान्तमोह गुणस्थान- फिटकरी युक्त जल या शरदऋतु के निर्मल जल के समान परिणाम होते हैं। 12.क्षीणमोह गुणस्थान- स्फटिक के पात्र में रखे निर्मल जल के समान वीतराग भाव होता है। 13.सयोगकेवली गुणस्थान-केवलज्ञान अन्धकार नाशक सूर्य के समान होता है। 14.अयोग केवली गुणस्थान-शरद ऋतु की पूर्णमासी के चन्द्रमा की कलाओं के समान, शील के अठारह हजार भेदों का स्वामी एवं शुद्ध स्वर्ण के समान होता है।
कर्म