Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 369

प्रतिपक्षी की भी प्रसिद्धि। यथायोग्य उदय।

9 सूत्र

संसार वृक्ष पर विचार।
अनासक्ति
आठ कर्मों का दृष्टान्त- देवता के मुख पर ढके वस्त्र के समान ज्ञानावरण, द्वारपाल के समान दर्शनावरण, शहद लपेटी तलवार के सामान वेदनीय, मदिरा के समान मोहनीय, बेड़ी के समान आयु, चित्रकार के समान नाम, कुम्भकार के समान गोत्र और भण्डारी के समान अन्तराय कर्म है, जिस प्रकार इनके भाव होते हैं उसी प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मों का स्वभाव भी जानना चाहिए।
कर्म
प्रतिपक्षी की भी प्रसिद्धि होती है- ज्ञान आत्मा का गुण है, आवरण विरोधी है पौद्गलिक है, फिर भी उसकी प्रसिद्धि है जैसे- राम के साथ रावण की, कृष्ण के साथ कंस की, गाँधी के साथ गोडसे की भी प्रसिद्धि है।
कर्म
स्त्यानगृद्धि निद्रा के उदय में सोता हुआ व्यक्ति उठा, नींद में ही दुकान खोली और कपड़ों को फाड़ कर आ गया, और उसे स्वयं पता नहीं चला कि कपड़ा किसने फाड़ा है।
कर्म
उदयपुर विद्यालय में एक बालक रात को नींद में उठकर नदी में नहाकर आता था, बच्चों ने पूँछा कहा जाते हो? उसने कहा! कहीं नहीं, बच्चों ने गुरुजी से कहा, गुरूजी उसके पीछे-पीछे नदी गये, बालक ने नदी में प्रवेश किया, गुरुजी ने आवाज दी, बालक की निद्रा भङ्ग हो गयी, भय के कारण बालक डूब कर मर गया।
कर्म
यथायोग्य उदय- मनुष्य के शरीर में चमड़ी का रङ्ग अलग, आँख की पुतली का अलग, नाखून का अलग, जीभ का अलग इनमें यथायोग्य उदय लगाना, पचरङ्गी फूल के समान, वर्तमान में पचरङ्गी मनुष्य नहीं किन्तु तीर्थंकर हुये हैं।
कर्म
मोह राजा है और मोहजन्य भाव आठों कर्मों के बन्ध के कारण हैं।
अनासक्ति
बलवान- कर्मों में मोहनीय कर्म, इन्द्रियों में रसना इन्द्रिय, गुप्तियों में मनोगुप्ति, व्रतों में ब्रह्मचर्य व्रत, ज्ञानों में केवलज्ञान, माता-पिता में तीर्थंकर के माता-पिता, भ्रमण शील में नारद, चञ्चलों में मन चञ्चल है।
विविध
उपयोग- राम ने शुद्धोपयोग के फल को, सीता ने शुभोपयोग के फल को, लक्ष्मण ने अशुभोपयोग के फल को प्राप्त किया था। रावण ने अशुभोपयोग के फल को, मन्दोदरी ने शुभोपयोग के फल को एवं इन्द्रजीत और मेघनाद ने शुद्धोपयोग के फल को प्राप्त किया था।
कर्म