Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 346

तीन वातवलय। नरक के आठ दुःख।

9 सूत्र

तीन वात वलय- जैसे साईकिल में तीन वलय होते हैं ट्यूब, टायर, रिङ्ग इन तीनों का समान अनुपात होता है, तो साईकिल वजन खींच ले जाती है, उसी प्रकार इन तीन वातवलयों के ऊपर ही तीन लोक का भार है, इस प्रकार मनुष्य, के शरीर में भी तीन वात वलय हैं, वात, पित्त, कफ इन तीनों के आधार से शरीर चलता है।
प्रकृति
प्रथम पृथ्वी, एक लाख अस्सी हजार योजन मोटी है, उनमें खर भाग सोलह हजार योजन, पङ्कभाग चौरासी हजार योजन, अब्बहुल भाग अस्सी हजार योजन मोटा है। द्वितीय पृथ्वी बत्तीस हजार योजन, तृतीय पृथ्वी अठ्ठाईस हजार योजन, चतुर्थ पृथ्वी चौबीस हजार योजन, पञ्चम पृथ्वी बीस हजार योजन, षष्टम पृथ्वी सोलह हजार योजन, सप्तम पृथ्वी आठ हजार योजन, इनके सब ओर बीस-बीस हजार योजन मोटे वातवलय हैं।
Misc.
श्रेणिबद्ध, पुष्पप्रकीर्णक, इन्द्रकबिल सभी पृथ्वियों के बिलों की संख्या कुल चौरासी लाख है।
Misc.
व्यक्ति अपराध बाहर करता है, भोगता जेल में है, उसी प्रकार अपराध यहाँ करता भोगता नरक में है।
कर्म
देव और नारकी दोनों का उप्पाद जन्म होता है पर देवों का सुखकर है, नारकियों का दु:खकर है, नरक में कोई दु:ख की कथा सुनने वाला नहीं, जिसको सुनावें वही भाला बनकर दु:ख देता है, यहाँ चींटी आदि को तो सुख है, किन्तु वहाँ क्षण मात्र भी सुख नहीं है, वहाँ का शोरगुल सुनलें, तो मनुष्य का हार्ट फेल हो जाये।
कर्म
अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना का काल छ्यासठ सागर है, दो छ्यासठ सागर भी सम्भव है जितना क्षयोपशम सम्यग्दर्शन का है, अन्तर्मुहूर्त के लिये तीसरे गुणस्थान में आकर पुन: ऊपर जा सकता है, प्रथमोपशम सम्यक्त्व वाला भी विसंयोजना करता है।
कर्म
एकेन्द्रिय जीव के सूक्ष्म बादर ये दो भेद होते हैं, सूक्ष्म का अर्थ साधारण नहीं है, पृथ्वीकायिक से वायु कायिक तक प्रत्येक ही होते हैं।
प्रकृति
कहीं ऐसा भी मिलता है कि भरत-ऐरावत क्षेत्र का प्रथम चक्रवर्ती ही वृषभाचल पर प्रशस्ति लिखता है अन्य चक्रवर्ती नहीं।
Misc.
एक करोड़ वर्ष में एक समय अधिक है तो अकाल मरण नहीं होगा, यदि एक समय कम है तो अकाल मरण हो सकता है।
समाधि