Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 34

सत्संगति इत्र की दुकान।

12 सूत्र

जो गुणवानों की अवहेलना करता है वह कठिन तप करता हुआ भी और शास्त्रसमुद्र को जानता हुआ भी कल्याण को प्राप्त नहीं होता है।
संगति
सेठ जी ने गाड़ी खरीदी पन्द्रह दिन ड्राईवर के पास बैठकर देख लिया कैसे चलाता है और ड्राईवर की छुट्टी कर दी और स्वयं चलाने लगे, जङ्गल में गाड़ी बिगड़ गयी, कुछ जानते नहीं थे, अतः दूसरे से मदद लेकर घर पहुँचे, इसी प्रकार जब तक मोक्ष मार्ग के सच्चे ड्राईवर न बन जायें, तब तक गुरुओं की सङ्गति में रहना चाहिए।
संगति
पृथिवी पर नीम के वृक्ष बहुत दिखाई देते हैं परन्तु चन्दन कहीं-कहीं प्राप्त होता है, पत्थरों से पृथिवी भरी पड़ी है परन्तु चिन्तामणि रत्न दुर्लभ है, कौओं की काँव-काँव सदा सुनायी पड़ती है परन्तु कोयल की कूक यदा-कदा ही सुनायी पड़ती है, इससे पता चलता है कि यह जगत् दुर्जनों से व्याप्त है सज्जन तो पृथिवी पर थोड़े ही हैं।
संगति
गुणवानों के साथ सङ्गति, गुणवानों के साथ वार्तालाप और गुणवानों के साथ मित्रता करने वाला मनुष्य दुःखी नहीं होता है।
संगति
सन्त जहाँ बैठ जाते हैं वहीं पर आनन्द यात्रा शुरू हो जाती है और जब चल देते हैं तो यात्रा का आनन्द शुरू हो जाता है।
संगति
सत्सङ्गति का फल बुद्धि है, बुद्धि का फल दुराग्रह का त्याग है, दुराग्रह के त्याग का फल शान्ति है और शान्ति रूपी वृक्ष का फल सुख है।
संगति
जहाँ अच्छी हवा नहीं होती वहाँ रोग बढ़ते हैं और जहाँ सत्सङ्ग नहीं होता वहाँ आत्म रोग बढ़ते हैं।
संगति
परिवार में रहने से संसार बढ़ता है अतः व्यतीत रात्रि और व्यतीत जिन्दगी पर दृष्टि पात करो और आगे के लिए सजग हो जाओ।
अनासक्ति
हर एक के अभिप्राय को सुनकर कुछ समय विचार करो, सहसा कदम मत बढ़ाओ।
विवेक
इत्र बेचने वाले के पास विना पैसे की सुगन्धी मिलती है, उसी तरह सत्सङ्गति में सुखी होने के सूत्र मिलते हैं।
संगति
सङ्गति का प्रभाव प्रकृति में भी देखने को मिलता है, वायु का सङ्ग पाकर धूल आकाश की ऊँचाईयों को प्राप्त होती है, वहीं धूल जल का साथ पाकर नीचे की ओर बहने वाली कीचड़ बन जाती है।
संगति
अग्नि के संयोग से पानी विभाव को प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार रागादि रूप अग्नि का स्पर्श होते ही स्वभाव भी विभाव रूप हो जाता है।
संगति