Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 321

रानी अमृता का छल।

4 सूत्र

गर्भ में ही स्वर्ग की आयु- गर्भस्थ शिशु जो अभी कुछ घण्टों का है वह तीसरे-चौथे स्वर्ग की आयु बाँध सकता है, जो कुछ दिनों का है तो वह पाँचवे-छटवे स्वर्ग तक की आयु बाँध सकता है, तीन माह से लेकर सात-आठ माह का नौवें से बारह वे स्वर्ग तक की आयु बाँध सकता है, जब अविकसित दशा में देवायु का बन्ध कर सकता है, तो विकसित अवस्था में क्या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता ?
कर्म
ध.पु.सप्तम्- भवनत्रिक के देव तथा सौधर्म-ईशान स्वर्ग के देव मरकर मनुष्य या तिर्यञ्च के गर्भ में आकर अन्तर्मुहूर्त पश्चात् वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, तीसरे-चौथे स्वर्ग के देव पृथक्त्व (तीन से नौ तक की संख्या को पृथक्त्व कहते हैं) मुहूर्त पश्चात तीसरे-चौथे स्वर्ग में उत्पन्न हो सकते हैं, पाँचवे से आठवें स्वर्ग के देव पक्ष पृथक्त्व में वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, नौवें से बारहवें स्वर्ग के देव मास पृथक्त्व में वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, तेरहवे से सोलहवे स्वर्ग के देव तथा ग्रैवेयक, अनुदिश, अनुत्तर स्वर्ग के देव मनुष्य स्त्री के गर्भ में आकर वर्ष पृथक्त्व पश्चात् उन्हीं स्वर्गों में उत्पन्न हो सकते हैं।
कर्म
उपवास से ब्रह्मचर्य पाला- एक महिला की शादी के कुछ दिन बाद पति मर गया, कुछ समय बाद सास भी मर गयी, ससुर ने सोचा बहु को खराब न लगे इसलिये श्रृंगार का सामान और अच्छा भोजन बहु के लिये उपलब्ध कराया, गरिष्ट भोजन से बहु के परिणाम बिगड़ गये, उसने ससुर से कहा कि हमसे अकेले नहीं रहा जाता, ससुर को चिन्ता हुई, सोचा गलती हमने की है, कि बहु के आहार का ध्यान नहीं रखा, ससुर ने उपवास करना शुरू किये, बहु ने भी उपवास किये, कुछ समय बाद जब इन्द्रियाँ शिथिल हुयी, तो ब्रम्हचर्य का पालन होने लगा।
ब्रह्मचर्य
रानी अमृता का छल- अष्टावक्र महावत के मधुर गान पर आसक्त होकर विषय सेवन करने लगी, रहस्य खुलने को हुआ तो यशोधर राजा को जहर दे दिया, वैद्यों को बुलाया, आने के पहले रानी छल से बोली, राजा को दृष्टिविष उत्पन्न हुआ, बाल बिखेर कर रोने लगी और राजा की छाती पर गिर पड़ी, चुपके से गला दबा दिया, राजा मर गया, अष्टावक्र के साथ खूब भोग भोगने लगी, अन्त में गलित कुष्ट हुआ, मरकर नरक गयी, मधुर स्वर के श्रवण से वासना जाग्रत होती है, इसलिये नहीं सुनना चाहिए।
ब्रह्मचर्य