Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 308

नींद हराम। छाँछ पीकर जोड़ा। बंदर की बंद मुट्ठी कर चना। हमारी बारह भावना।

6 सूत्र

नींद हराम- एक व्यक्ति ने मन्त्र जाप किया, विद्या सिद्ध हो गयी, विद्या ने कहा जो चाहो सो माँग लो, तो उसने कहा कल माँगेंगे, घर जाकर रात भर सोचता रहा घर, नौकर धन, या स्वयं तहसील दार, कलेक्टर, मुख्यमन्त्री या प्रधान मन्त्री क्या माँगे? रात भर सोचता रहा सो नहीं सका, सुबह विद्या से कहा कि अभी धन हमारे पास आया नहीं, तब नींद उड़ गयी, आने पर क्या होगा, इसलिए उसने कहा हमें कुछ नहीं चाहिए।
संतोष
छछ पीकर घी जोड़ा- श्मश्रु नवनीत ने पहले धनार्जन किया, चोरों ने लूट लिया, गरीब हो गया, तो ग्वालों के यहाँ रहने लगा, वहाँ से मठा लाता था पीकर दिन निकालता, मूँछों में जो नवनीत लग जाता उसको निकाल कर इकट्ठा कर लेता था, कुछ महिनों में एक मटकी भरली और आशा के महल बनाने लगा, कि व्यापार करते-करते राजा चक्रवर्ती आदि बनूंगा, रानियाँ पैर दबायेंगी तो मैं कहूँगा तुमसे पैर दबाते नहीं बनता, और पैर छुड़ा लूँगा, उसने सपने में पैर झटकारा जैसे ही पैर मटकी में लगा, नवनीत अग्नि में गिरा, आग भड़की घास की झोपड़ी जल गयी और वह जल कर मर गया।
संतोष
सिक्का राजा को दिया- एक साधु जङ्गल में विराजे थे, उनको कोई दर्शनार्थी सिक्का चढ़ा गया, साधु ने सोचा यह सिक्का किस गरीब को देना चाहिए, इतने में राजा किसी पर चढ़ाई करने के लिये निकल रहा था, सन्त ने सोचा, इससे ज्यादा गरीब कोई नहीं, इसलिये साधु ने सिक्का राजा की पालकी पर फेंक दिया, तव राजा ने साधु से पूँछा आपने यह सिक्का यहाँ क्यों फेका? साधु ने कहा दूसरों को लूटने जा रहे हो इसलिये भिखारी हो अतः मैंने आपको भीख दी है।
अनासक्ति
बन्दर मुठ्ठी बाँध कर घड़े से चने निकालता है, जब हाँथ नहीं निकलता, तो कहता है इस घड़े ने पकड़ लिया, वास्तव में तो उसने घड़े को पकड़ रखा है, इसी प्रकार संसारी प्राणी ने स्वयं गृहस्थी को पकड़ रखा है और कहता है परिवार के लोग नहीं छोड़ते हैं।
अनासक्ति
सम्पति के कमाने में कलुषता और व्यय करने में दुरभिमान होता है, इस तरह जहाँ कषाय का ही साम्राज्य है, वहाँ शान्ति कैसे मिल सकती है?
अनासक्ति
हमारी बारह भावना- राजा राणा छत्रपति हाथिन के असवार। पैसा हेतु घर छोड़कर भ्रमत जीव संसार।। दलबल देवी-देवता मात-पिता परिवार। बिन पैसे के जीव को कोई न राखन हार।। दाम विना निर्धन दुःखी तृष्णा वश धनवान। बीस लाख की लॉटरी, खोल देहु भगवान।। आप अकेला अवतरे मरे अकेला होय। पत्नी बिन संसार में, और न दूजो कोय।। जहाँ देह अपनी नहीं तहाँ न अपना कोय। पैसे के प्रभाव से, पर जन अपना होय।। दिपे चाम चादर मणि हाड़ पींजड़ा देह। तैल पाउडर पोत के, दुनिया वस कर लेय।। मोह नींद के जोर जगवासी घूमे सदा। पैसा धरे बटोर के, खबर नहीं भगवान की।। सतगुरु देय जगाय मोहनींद जब उपशमे। पैसा इन्हें दिखाय, चिन्ता करे दुकान की।। ज्ञान दीप तप तैल भर घर शोधे भ्रम छोर। माल रखाते रात भर, ले न जावे चोर।। पञ्च महाव्रत सञ्चरण समिति पञ्च परकार। इन्हें त्याग कर नित करे पञ्च पाप से प्यार।। चौदह राजू उतङ्ग नभ लोक पुरुष सण्ठान। मैं सबका स्वामी बनूं, कृपा करो भगवान्।। धन कन कञ्चन राजसुख सबही सुलभ कर जान। दुर्लभ है कञ्जूस घर, मिल जाए जल पान।। जाँचे सुर तरु देय सुख चिन्तत चिन्ता रैन। बिन जाए इस जगत में, पत्नी ही सुख देन।। आप अकेला अवतरे मरे अकेला होय। माया चारी के विना, लखपति कैसे होय।।
अनासक्ति