रत्न आते ही भाव बिगड़े- अहिदेव और महिदेव दोनों भाइयों ने विदेश में बहुत धन सञ्चित किया, जब घर आने लगे तो एक रत्न खरीद लिया, वह जिस भाई के पास रहता था, उसके भाव खराब हो जाते थे, घर आकर माता को दिया, उसके भाव भी बेटों को मारने के हो गये, सुबह मुनिराज के दर्शन प्रवचन को गयी, वहाँ भाव परिवर्तन हो गये, घर आकर माँ ने वह रत्न बेटों को देकर कहा यह रत्न समुद्र में फेक आओं, उसके बाद शान्ति से रहने लगे, यदि शान्ति चाहिए तो आकिञ्चन्य धर्म को अपनाना पड़ेगा। अनासक्ति 0 – भेजें
चाणक्य के पैर में काँटा लगा, चाणक्य ने काँटे को जड़ से उखाड़कर उसकी जड़ में मट्ठा डाल दिया, जिससे दोबारा न उगे, इसी तरह काम-क्रोध आदि अन्तरङ्ग शत्रुओं को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। संयम 0 – भेजें
पण्डित पन्नालालजी साहित्याचार्य सागर वालों का बेटा इन्दौर अस्पताल में भर्ती था, पण्डित जी बहुत दुःखी थे, एक सज्जन उन्हें देखने आये, उन्होंने कहा चलो अस्पताल घूम कर आते हैं, अस्पताल में किसी का हाँथ टूटा है, किसी का पैर टूटा है, किसी का आग से पूरा शरीर जल गया है, सज्जन ने पण्डितजी से कहा, इन्हें देखकर अपन को दुःख नहीं हो रहा है, इसी तरह दुनिया में रोज हजारों लोग मरते हैं, जेलों में हजारों बन्द होते है, हजारों पेट भरने के लिये रोते हैं, लाखों एक-एक रुपये को मुहताज हैं, उनको देखकर हमें कुछ नहीं होता, तथा हमारा बेटा बीमार हो जाये तो हमें कष्ट होता है, यह राग या ममत्व भाव का परिणाम है। अनासक्ति 0 – भेजें
सेठ का चार साल का बच्चा गुम गया, सेठ ने बहुत ढूँढा पर कही नहीं मिला, तब एक नौकर को रख लिया, उससे रात दिन काम लेते थे, एक दिन नौकर बीमार हो गया सेठानी ने आवाज दी, उसने नहीं सुना, गुस्से में जाकर सेठानी ने उसका चादर खींचा और कहा चल काम कर, तभी उसके हाँथ में गुदा हुआ नाम देखा, पढ़ा तो सोचा यही नाम तो हमारे बेटे का था, पन्द्रह वर्ष हो गये अभी तक वापस नहीं आया, बच्चे से पूँछा, तो उसने कहा! मैं अपने माँ बाप को नहीं जानता, मैं पन्द्रह साल पहले खो गया था, बाद में माता-पिता नहीं मिले, यही मेरा पुत्र है ऐसा समझ कर सेठ-सेठानी खुशी से उछल पड़े, अब मेरा बेटा मिल गया और उसे छाती से लगा लिया, पहले उससे शक्ति से ज्यादा काम लेते थे पर अब उसे जरा भी कष्ट नहीं देना चाहते थे, मोही जीव अपने और पराये से ऐसा व्यवहार करते हैं। अनासक्ति 0 – भेजें