जो भी कार्य करो पहले दृढ़ सङ्कल्पी बनो, साधनों का संग्रह करो, बाधक कारणों का परित्याग करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
शान्तिपाठ से शान्ति नहीं, अशान्ति के कारणों को दूर करने पर शान्ति होती है, बाह्य भेष से पर को ठगना स्वयं को दुःख का कारण है। चरित्र 0 – भेजें
सत्पुरूषों का दान कल्पवृक्ष की शोभा की तरह है, लोभी का दान शव के विमान की शोभा की तरह है। दान 0 – भेजें
जन और जिन में इतना ही अन्तर है कि जन वैभव को अपने शिर पर बैठाये है और जिन वैभव के सिर पर बैठे हैं। अनासक्ति 0 – भेजें
द्रव्य भाव शुद्धि- द्रव्य से शुद्ध भोजन भी भाव के अशुद्ध होने से अशुद्ध हो जाता है, क्योंकि अशुद्ध भाव बन्ध के लिए और शुद्ध भाव मोक्ष के लिए है, नव कोटि से विशुद्ध दान बहुत फल दायक होता है, दाता की विशुद्धता देय-भोज्य को और पात्र को पवित्र करती है, देय की शुद्धता दाता और पात्र को पवित्र करती है और पात्र की शुद्धि दाता और देय को पवित्र करती है। दान 0 – भेजें
गणेश प्रसाद वर्णीजी ने एक गरीब को ठण्ड में अपना गद्दा दे दिया था, तब से गद्दा छोड़ दिया था, बरुआ सागर से आ रहे थे, रास्ते में एक गरीब को चादर दे दिया था, एक बार गरीब को पानी पिलाया, लोगों ने कहा, तुमने लोटा खराब कर दिया, तो लोटा भी उसी गरीब को दे दिया था। दान 0 – भेजें
औषधि दान- जो औषध दान करने वाले का फल वचनों से कहता है, वह मानों अञ्जुलि के द्वारा समुद्र के जल को नापता है। दान 0 – भेजें
कृष्णजी ने मुनिराज के रोग को दूर करने का निश्चय किया, वैद्य की सलाह से औषधि के लड्डू पूरे नगर के चौकों में भेजे, साधु स्वस्थ हो गये इसके फल स्वरूप कृष्ण जी ने तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया था। दान 0 – भेजें
सोला-सोलह प्रकार का- द्रव्यशुद्धि- 1. अन्न 'सड़ा, घुना न हो', 2.जल शुद्ध हो 3. ईंधन शुद्ध हो, 4. भोजन बनाने वाला शुद्ध हो। क्षेत्र शुद्धि- 1. प्रकाश हो, 2.वायु हो, 3.दुर्गन्ध न हो, 4.चौके में शौचालय न हो। काल शुद्धि- 1.ग्रहण न हो, 2.शोक न हो, 3.रात्रि न हो, 4.जिस काल में प्रभावना हो उस काल में दान देना। भाव शुद्धि- 1.दान देने का भाव हो, 2.करुणा सहित हो, 3.वात्सल्य सहित हो, 4.विनय सहित हो। दान 0 – भेजें