Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 258

स्वाध्याय तास का- विश्वास मोक्ष का।

6 सूत्र

वैयावृत्य- निश दिन वैयावृत्य करैया सो निश्चय भव नीर तरैया।
दान
जो साधु वैयावृत्ति में कुशल, विनयी, सर्वसङ्घ का पालक, वैरागी और जितेन्द्रिय होता है उसे प्रज्ञाश्रमण कहा जाता है।
संयम
सूत सहित सुई गुमने पर शीघ्र मिल जाती है, उसी प्रकार सूत्र अर्थात् आगम (ज्ञान) सहित आत्मा चार गति चौरासी लाख योनियों में भटकती नहीं है।
ज्ञान
स्व-पर का कथन और चार अनुयोग का अभ्यास करना-कराना व धर्म ध्यान सहित काल व्यतीत करना तप है।
ज्ञान
'स्वाध्यायः परमं तपः'- स्वाध्याय परम तप है। 'तपसा निर्जरा च' - तप से संवर के साथ निर्जरा भी होती है।
ज्ञान
स्वाध्याय-''ताश का विश्वास मोक्षमार्ग का''-पन्द्रह मिनट के स्वाध्याय ने जीवन बदल दिया। एक जुआरी ने साधु के दर्शन से दो नियम लिए, पहला देव दर्शन, दूसरा पन्द्रह मिनट का स्वाध्याय और पाँच मिनट का चिन्तन, एक दिन वह मन्दिर देरी से गया, भगवान् के दर्शन खिड़की से हो गये, लेकिन स्वाध्याय को शास्त्र जी नहीं मिला, जेब से ताश के पत्ते निकाल कर चिन्तन शुरू किया। पहला पत्ता इक्का पर विचार करता है- निश्चय से मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, दर्शन-ज्ञान मय हूँ, सदा अरूपी हूँ, परमाणु मात्र भी अन्य द्रव्य मेरा कुछ नहीं है। 2 नं. के पत्ते पर विचार- जिस प्रकार दो छोर वाली रस्सी से मथानी मटकी में भ्रमण करती है उसी प्रकार राग-द्वेष रुपी दो छोरों के माध्यम से यह जीव संसार रुपी मटकी में भ्रमण करता है। 3 नं. पर विचार- मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीन संसार के कारण हैं एवं सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीन मोक्ष के कारण हैं। 4 नं. पर विचार चार कषाय से चार गति में भ्रमण होता है। पाँच पापों से पञ्च परावर्तन होता है। छह लेश्याओं में तीन शुभ और तीन अशुभ होती हैं। सप्त व्यसनों के सेवन से सातों नरकों में भ्रमण होता है। अष्ट मद एवं अष्ट शंकादि दोष त्यागे नहीं तथा अष्ट मूलगुण धारण नहीं किये। नौ पथार्थों को जाना नहीं। दस धर्म धारण नहीं किये। ग्यारह प्रतिमा पाली नहीं। बारह तपों को तपा नहीं। ''इस प्रकार बारह भावनाओं का चिन्तन करने से वैराग्य हो गया'', तब तेरह प्रकार का चारित्र पालन करेंगेऔर मोक्ष प्राप्त करेंगे। सीधे क्रम से चिन्तन करता है कि आदमी अकेला आया है, अकेला ही जायेगा, पुनः शरीर धारण नहीं करना पड़ेगा, यदि रत्नत्रय को धारण किया है, चार अनुयोगों का अध्ययन किया है, पाँच महाव्रतों को धारण किया हैं, छः आवश्यकों का पालन किया है, सात तत्त्वों का चिन्तन किया है, आठ कर्मों से छूटेंगे, नव देवताओं में नम्बर आ जायेगा, दस धर्मों का उदय होगा, अब मन का गुलाम नहीं बनना पड़ेगा, इन्द्रियाँ बेगम नहीं बनेगी, आत्मा बादशाह होगी।
ज्ञान