ससुर का तो जन्म ही नहीं हुआ- बहु ने मुनिवर से पूँछा आप इतनी जल्दी कैसे आ गये? मुनिवर ने कहा समय का क्या भरोसा, मुनिवर ने पूँछा तुम्हारी उम्र कितनी है? बहु ने कहा मेरी उम्र तीन वर्ष, पति की एक वर्ष, सासु की छः माह और ससुर का अभी जन्म ही नहीं हुआ, ससुर को सुनकर गुस्सा आया और बोला कि मेरे विना तेरा पति कहाँ से आया? और मुनि महाराज से इसका समाधान पाने के लिए गया, मुनि महाराज ने कहा जिसके जीवन में जब धर्म उतरता है तभी से उसका जन्म होता है इस अपेक्षा बहु ने ऐसा उत्तर दिया है। धर्म 0 – भेजें
पार होने के लिए घाट चाहिये-जिस प्रकार छोटी सी नदी पार करने के लिए घाट की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार संसार समुद्र को पार करने के लिए द्वादशांग के घाट की आवष्यकता होती है। धर्म 0 – भेजें
यह आँख खुली का वह आँख बन्द का-राजा का इकलौता बेटा मर गया, राजा की आँख खुली तो हँसने लगा, रानी के पूँछने पर बोला अभी-अभी स्वप्न में आठ आज्ञाकारी पुत्रों को देख रहा था, पर आँख खुलने पर वे गायव हो गये अब मैं सोच रहा हूँ, कि उसके खोने के लिए रोऊँ या इसके लिए रोऊँ, मन में आता है कि वो बन्द आँख का स्वप्न था और ये खुली आँख का स्वप्न है, दोनों झूठे है अतः रोना व्यर्थ है और राजा आत्म कल्याण में लग गया था। समाधि 0 – भेजें
अभय दान प्रदाता मृगसेन धीवर- अवन्ती देश के अन्तर्गत शिरीष नामक ग्राम में मृगसेन नाम का धीवर रहता था। क्षिप्रा नदी में मछली मारने जाते समय यशोधर मुनिराज से जाल में आई प्रथम मछली न मारने का नियम लिया, एक बड़ी मछली पाँच बार जाल में आई पर उसने नहीं पकड़ा, खाली हाथ आता देख कर उसकी पत्नी 'घण्टा' ने नाराज होकर दरवाजा बन्द कर लिया। धीवर घर के बाहर पुराने काष्ठ पर 'णमोकार मन्त्र' पढ़कर सो गया, रात में सर्प के काटने से मर गया, पत्नी भी अगले जन्म में ये ही मेरे पति हों ऐसा निदान कर, साथ में उसी चिता में जलकर मर गयी। विशाला नगरी में राजा विश्वम्भर राज करते थे, रानी का नाम विश्वगुण था। वहीं गुणपाल सेठ एवं धनश्री सेठानी पुत्री के साथ रहते थे। धनश्री के गर्भ में मृगसेन धीवर का जीव आया। राजा से नर्मभर्म मन्त्री ने अपने पुत्र नर्मधर्म के लिए गुणपाल की पुत्री से विवाह करवाने के लिए कहा, सेठ अपनी स्त्री को अपने मित्र श्रीदत्त के पास छोड़कर पुत्री एवं कुछ धन लेकर कौशाम्बी में रहने लगा। आहार को आये शिवगुप्त व मुनिगुप्त में से छोटे मुनि ने धनश्री को देखकर शिवगुप्त मुनि से कहा ''इसके गर्भ में कोई अभागा आया है'', शिवगुप्त मुनि बोले ''तुम्हारा अनुमान गलत है, इसके गर्भ में धर्मात्मा पुत्र आया है और उसका विवाह राजपुत्री से होगा'', श्रीदत्त ने सुनकर ईर्ष्या वश पुत्र को मारने का विचार किया। प्रसव के समय धनश्री मूर्छित हो गयी। श्रीदत्त ने चाण्डाल को पुत्र देकर मारने को कहा, वह सुरक्षित स्थान पर छोड़ कर चला गया। श्रीदत्त का बहनोई इन्द्रदत्त माल बेचने आया, ग्वालों से सुनकर पुत्र को ले गया। श्रीदत्त को पता चला तो वह मायाचारी से बहन व भाञ्जे को लाकर पुनः चाण्डाल को लोभ देकर मारने को दिया, उसने दयावश नदी के किनारे गुफा में छोड़ दिया, वहाँ से ग्वालों का मुखिया गोविन्द ले गया। एक दिन श्रीदत्त घी खरीदने आया और सन्देश देने के बहाने धनकीर्ति को घर भेजा और पत्र में लिख दिया कि 'पत्र वाहक को विष देकर मार देना'। धीवर का जीव 'धनकीर्ति' पत्र गले में बाँधकर चला, रास्ते में थकान दूर करने एक वृक्ष के नीचे सो गया, फूल तोड़ने आई 'मछली का जीव' अनङ्गसेना वेश्या ने वह पत्र पढ़ा और आँख के काजल से उन शब्दों को बदल दिया, कि 'प्रिय यदि तुम अपना स्वामी समझती हो और पुत्र महाबल तुम मुझे अपना पिता समझते हो तो पत्र वाहक के साथ पुत्री श्रीमती का विवाह कर देना। नींद खुलते ही उसने जाकर पत्र दिया, शुभमुहूर्त में श्रीमती के साथ उसका विवाह हो गया। श्रीदत्त को पता चला तो उसने गाँव के बाहर पार्वती के मन्दिर में उसको मारने के लिए व्यक्ति नियुक्त किया। आकर दामाद को पूजा की सामग्री देकर भेजा, रास्ते में साले 'महाबल' ने सामग्री लेली और मन्दिर गया तो महाबल मारा गया। हताश होकर पत्नी से दामाद धनकीर्ति को मारने को कहा, पत्नी ने साफ़ लड्डू विष मिश्रित व मैले लड्डू सादे बनाये और पुत्री से साफ़ लड्डू दामाद को व मैले लड्डू पिता को परोसने को कहकर नदी नहाने को चली गयी। पुत्री ने लज्जा वश मैले लड्डू पति को व साफ़ लड्डू पिता को परोस दिए, श्रीदत्त का मरण जान उसकी पत्नी ने भी विषैले लड्डू खाकर मरण किया। राजा ने धन कीर्ति के गुण व ब्रह्मचर्य की प्रशंसा सुनकर अपनी पुत्री की शादी कर व दहेज़ देकर राज श्रेष्ठी के पद पर नियुक्त किया। गुणपाल पिता अपने पुत्र के भाग्योदय को सुनकर पुत्र से मिला, कुछ दिन बाद सपरिवार यशोधर मुनि की वन्दना कर धनकीर्ति के पूर्व भव की कथा सुनी। धनकीर्ति पूर्व भव में धीवर था, घण्टा स्त्री इस भव में श्रीदत्त कि पुत्री श्रीमति वनी, मछली अनङ्गसेना वेश्या वनी, धनकीर्ति ने दीक्षा लेली। श्रीमति और अनङ्गसेना ने भी दीक्षा लेली, धनकीर्ति सन्यास पूर्वक प्राण त्याग कर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ और आगे केवली हो मोक्ष प्राप्त करेगें। श्रीमति और अनङ्गसेना भी स्वर्ग गयीं। सच है दया धर्म रुपी कल्पवृक्ष से मनोवाञ्छित फल मिलता है। अहिंसा 0 – भेजें